भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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कवि वहाँ भी आकर बोला- विद्वान् लोग यह असत्य ही कहते हैं कि तुम सदा सब को सब कुछ दिया करते हो, न तो तुम्हारे शत्रुओं ने तुम्हारी पीठ पायी और न पर नारियों ने तुम्हारा वक्षःस्थल पाया । तो राजा अपनी सब धरती को दी मान कर उठ गया । कविश्च तदभिप्रायमज्ञात्वा पुनराह— 'राजन्कनकधाराभिस्त्वयि सर्वत्र वर्षति । अभाग्यच्छत्रसंछन्ने मयि नायान्ति बिन्दवः' ॥ ३१४ ॥ कवि ने राजा का अभिप्राय न समझ कर फिर कहा— हे राजा, सब स्थानों पर तुम्हारे स्वर्ण धाराओं की वर्षा करने पर भी अभाग्य के छाते से ढके मुझ पर बूँदें नहीं गिरतीं । तदा राजा चान्तःपुरं गत्वा लीलादेवीं प्राह-'देवि, सर्वं राज्यं कवये दत्तम्। तत्तपोवनं मया सहागच्छ' इति। अस्मिन्नवसरे विद्वान्द्वारि निर्गतः। बुद्धिसागरेण वृद्धामात्येन पृष्टः- 'विद्वन्, राज्ञा किं दत्तम्' इति। स आह-'न किमपि' इति। तदामात्यः प्राह- 'तत्रोक्तं श्लोकं पठ।' ततः कविः श्लोकचतुष्टयं पठति। अमात्यस्ततः प्राह-'सुकवे, तव कोटिद्रव्यं दीयते; परं राज्ञा यदद्य तव दत्तं भवति तत्पुनर्विक्रीयताम्' इति, कविस्तथा करोति। ततः कोटिद्रव्यं दत्त्वा कविं प्रेषयित्वामात्यो राजनकटमागत्य तिष्ठति स्म। तब राजा ने रनिवास में जाकर लीला देवी से कहा-'देवी, सारा राज्य कवि को दे दिया। सो मेरे साथ तपोवन चलो'। इसी अवसर पर विद्वान् द्वार पर निकल आया। बूढ़े मंत्री बुद्धिसागर ने पूछा-'हे विद्वान्, राजा ने क्या दिया?' वह बोला-'कुछ भी नहीं।' तो अमात्य ने कहा-'वहाँ पढ़े श्लोक पढ़ो।' तो कवि ने चारों श्लोक पढ़ दिये। तब मंत्री ने कहा-'हे सुकवि, तुम्हें एक करोड़ द्रव्य देता हूँ, पर राजा ने इस समय जो कुछ दिया है, उसे बेच दो।' कवि ने वैसा ही किया। तो कवि को एक करोड़ द्रव्य देकर भेज कर मंत्री राजा के पास जाकर बैठा।