भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 190 में से

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१६८ •भोजप्रबन्धः तदा राजा च तमाह - 'बुद्धिसागर, राज्यमिदं सर्वं दत्तं कवये। पत्नीभिः सह तपोवनं गच्छामि। तत्र तपोवने तवापेक्षा यदि मया सहागच्छ' इति। ततोऽमात्यः प्राह- 'देव, तेन कविना कोटिद्रव्य- मूल्येन राज्यमिदं विक्रीतम्। कोटिद्रव्यं च विदुषे दत्तम्, अतो राज्यं भवदीयमेव। भुङ्क्ष्व' इति। तदा राजा च बुद्धिसागरं विशेषेण संमानितवान्। तब राजा ने उससे कहा-'बुद्धिसागर, यह सारा राज्य कवि को दे दिया। पत्नी सहित वन जा रहा हूँ। यदि वहाँ तपोवन में तुम्हें मेरे साथ की अपेक्षा हो तो मेरे साथ आओ।' तब मंत्री बोला--'महाराज, एक करोड़ द्रव्य मूल्य में उस कवि ने यह राज्य बेच दिया है और एक करोड़ द्रव्य विद्वान् को दे दिया गया है, इस लिए राज्य आपका ही है। भोग कीजिए।' तो राजा ने बुद्धिसागर का विशेष संमान किया। --:०:-- ( ३० ) तक्रविक्रीती युवती अन्यदा राजा मृगयारसेनाटवीमल्ललाटन्तपे तपने क्षूनदेहः पिपासापर्याकुलस्तुरगमारुह्योदकार्थी निकटतटभुवमटंस्तदलव्ध्वा परि- श्रान्तः कस्यचिन्महातरोरधस्तादुपविष्टः। तत्र काचिद्गोपकन्या सुकुमा- रमनोज्ञसर्वाङ्गा यदृच्छया धारानगरं प्रति तक्रं विक्रीतुकामा तक्रभाण्डं चोद्वहन्ती समागच्छति। तामागच्छन्तीं दृष्ट्वा राजा पिपासावशादेतद्भा- ण्डस्थं पेयं चेत्पिवामीति बुद्ध्यापृच्छत्--'तरुणि, किमावहसि' इति।' एक और वार राजा आखेट के शौक में जंगल में घूम रहा था; जब सूरज सिर को तपाने लगा तो खिन्न-दुःखी, प्यास से अत्यंत व्याकुल, जल के लिए घोड़े पर चढ़ निकटवर्त्ती तट भूमि में घूमते-फिरते जल को न पा, थक कर एक बड़े वृक्ष के नीचे जा बैठा। उधर एक सुकुमार और मनोहर सब अंगों वाली ग्वाले की कन्या अपनी इच्छा से माठा बेचने के निमित्त माठे का वरतन लिये धारा नगर की ओर जाती, चली आ रही थी। राजा ने उसे आती हुई देखकर प्यास के वश हो यह सोचा कि इसके वरतन में यदि कोई पीने की वस्तु हो तो पिऊँ और पूछा-'हे तरुणी, क्या ले जा रही हो?'

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