भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १६६ ॥ च तन्मुखश्रिया भोजं मत्वा तत्पिपासां च ज्ञात्वा तन्मुखावलोकन- शाच्छन्दोरूपेणाह- 'हिमकुन्दशशिप्रभशङ्कनिभं परिपक्व कपित्थ सुगन्धरसम् । युवतीकरपल्लवनिर्मथितं पिव हे नृपराज रुजापहरम्' ॥३१५॥ इति । उसके मुख की कांति से उसने उसे भोज मानकर और उसकी प्यास को जानकर उसके मुख को देखने के लिए छंद रूप में कहा- बर्फ कुंद, चंदा और शंख के समान श्वेत, पके हुए कैथ का सुगंधित जैसे रस है, युवती के कोमल कर-किसलय से मथा हुआ पान करें राज-राज, सर्वरोगहर है। राजा तच्च तक्रं पीत्वा तुष्टस्तां प्राह--'सुभ्रूः, किं तवाभीष्टम्' इति । च किंचिदाविष्कृतयौवना मदपरवशमोहाकुलनयना प्राह-'देव, कन्यामेवावेहि ।' वह मीठा पीकर संतुष्ट हो राजा ने उससे कहा-'हे सुंदर भ्रुकुटी ने, तुम्हारी क्या कामना है?' जिसका यौवन कुछ-कुछ प्रकट हो था, ऐसी वह मद के परवश हो चंचल नेत्रों से मोह प्रकट करती हुई ने- 'महाराज, मुझे कुमारी कन्या ही समझें । सा पुनराह- 'इन्दुं कैरविणीव कोकपटलीवाम्भोजिनीवल्लभं मेघं चातकमण्डलीव मधुपश्रेणीव पुष्पव्रजम् । माकन्दं पिकसुन्दरीव रमणीवात्मेश्वरं प्रोषितं चेतोवृत्तिरियं सदा नृपवर त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते' ॥३१६॥ यथा कुमुदिनी शशि को चाहे, सूरज को मंडल चकवों का, झुंड पपीहों का बादल को, फूलों को समूह भ्रमरों का, आमों को कोयलिया, बिछुड़ा अपना पति रमणी को वांछित, मनोवृत्ति यह सदा नृपतिवर, तुम्हें देखने को उत्कंठित । राजा चमत्कृतः प्राह-'सुकुमारि, त्वां लीलादेव्या अनुमत्यास्वीकुर्मः।' इति धारानगरं नीत्वा तां तथैव स्वीकृतवान् ।