भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१७० भोजप्रबन्धः चमत्कृत हो राजा ने कहा—'हे सुकुमारी तुम्हें लीलादेवी की अनुमति से स्वीकारूँगा।' और उसे धारा नगरी ले जाकर उसी प्रकार स्वीकारा। —: o :— ( ३१ ) विलक्षणसमस्यापूर्तिः कदाचिद्राजाभिषेके मदनशरपीडिताया मदिराक्ष्याः करतलगलितो- हेमकलशः सोपानपङ्क्तिषु रटन्नध पपात । ततो राजा सभायामागत्य- कालिदासं प्राह--'सुकवे, एनां समस्यां पूरय--'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।' किसी समय राजा के स्नान के अवसर पर काम बाण से पीड़ित मदमाते नयनों वाली तरुणी की हथेली से छूटा सोने का कलसा सीढ़ियों पर टकराता गिर गया। तो राजा ने सभा में आकर कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस समस्या की पूर्ति करो—'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।' ततः कालिदासः प्राह-- 'राजाभिषेके मदविह्वलाया हस्ताच्च्युतो हेमघटो युवत्याः। सोपानमार्गे प्रकरोति शब्दं टटंटटंटंटटंटंटंटम् ॥ ३१७ ॥ तदा राजा स्वाभिप्रायं ज्ञात्वाक्षरलक्षं ददौ। तो कालिदास ने कहा— नृप के नहाते मद विह्वला के कर से छूटा स्वर्णकलश युवति के, करने लगा शब्द सुसीढ़ियों पर टटंटटंटंटटंटंटंटंटंटम्। तब राजा ने अपना अभिप्राय समझकर प्रत्यक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं। —: o :— ( ३२ ) चौरो मुककुण्डः कविः अन्यदा सिंहासनमलंकुर्वाणे श्रीभोजे कश्चिच्चौर आरक्षकै राज- निकटं नीतः। राजा तं दृष्ट्वा 'कोऽयम्' इत्यपृच्छत्। तदा रक्षकः प्राह-- 'देव, अनेन कुम्भिलकेन कस्मिंश्चिद्वेश्यागृहे घातपातमार्गेण द्रव्या- ण्यपहृतानि' इति। तदा राजा प्राह--'अयं दण्डनीयः' इति। अन्य वार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर रखवाले एक चोर को राजा के निकट लाये। राजा ने उसे देखकर पूछा—'यह कौन है?' तो