भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः १७१ रखवाला बोला—'महाराज, इस चोर ने एक वेश्या के घर में सेंध के रास्ते से द्रव्य चुराये हैं।' तो राजा ने कहा--'इसे दंड दो।' ततो भुक्कुण्डो नाम चौरः प्राह— 'भट्टिर्नष्टो भारवीयोऽपि नष्टो भिक्षुर्नष्टो भीमसेनोऽपि नष्टः। भुक्कुण्डोऽहं भूपतिस्त्वं हि राजन्भोभापङ्क्तावन्तकः संनिविष्टः।३१६॥ तो भुक्कुंड नाम का चोर बोला— नष्ट हुआ भट्टि, भारवीय भी विनष्ट हुआ नष्ट, भीमसेन भी विनष्ट है, भुक्कुंड मैं हूँ और तू है भूपति भोज 'भा-भा' की पंक्ति में यमराज संनिविष्ट है। तदा राजा प्राह--'भो भुक्कुण्ड, गच्छ गच्छ यथेच्छं विहर।' तो राजा ने कहा--अरे भुक्कुंड, जा भाग, यथेच्छया विहार करता रह।' --: ० :-- ( ३३ ) कविसत्कारः कदाचिद्द्रोजो मृगयापर्याकुलो वने विचरन्विश्रमाविष्टहृदयः कञ्चित्तटाकमासाद्य स्थितवान्श्रममाप्तसुप्तः । ततोऽपरपयोनिधिकुहरं गते भास्करे— तत्रैवारोचत निशा तस्य राज्ञः सुखप्रदा। चञ्चच्चन्द्रकरानन्द संदोहपरिकन्दला ॥३१६ ॥ कभी मृगया में व्यस्त भोज वन में विचरण करते हुए विश्राम करने की इच्छा से किसी तालाब पर पहुँच जा बैठा और श्रम के कारण सो गया। तब सूर्य के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर वहीं चमकते चंद्रमा की किरणों के आनंद से परिपूर्ण सुखदायिनी रात राजा को अच्छी लगी। ततः प्रत्यूषसमये नगरीं प्रति प्रस्थितो राजा चरमगिरिनितम्ब- लम्बमानशशाङ्कविम्बमवलोक्य सकुतूहलः सभामागत्य तदा समीप- स्थान्कवीन्द्रान्निरीक्ष्य समस्यामेकामवदत्--'चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं ललम्बे।'