भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ भोजप्रबन्धः तब प्रभात वेला में नगरी की ओर जाते राजा ने अस्ताचल श्रेणी में लटकते चंद्रविम्ब को देखकर कुतूहल पूर्वक सभा में आ उस समय निकटवर्ती कवियों का निरीक्षण करके एक समस्या पढ़ी--'चंद्र विम्ब लटक गया अस्ताचलभाल में।' तदा प्राह भवभूतिः-- 'अरुणकिरणजालैरन्तरिक्षे गतर्ते' तो भवभूति ने कहा-- 'नभ में रवि किरणों से सितारे मिट जाने पर' ततो दण्डी प्राह-- 'चलति शिशिरवाते मन्दमन्दं प्रभाते।' तब दंडी ने कहा-- 'मंद मंद शीत पवन बहते उपाकाल में।' ततः कालिदासः प्राह-- 'युवतिजनकदम्वे नाथमुक्तौष्ठबिम्बे चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं ललम्बे' । तदनंतर कालिदास ने कहा-- 'स्वामियों से नारियों के मुक्त होते ओष्ठबिम्ब चंद्रबिम्ब लटक गया अस्ताचल-भाल में।' ततो राजा सर्वानपि संमानितवान् । तत्र कालिदासं विशेषतः पूजितवान् । तब राजा ने सब कवियों का संमान किया और कालिदास की विशेष आराधना की। --: ० :-- ( ३४ ) रोगीराजा अथ कदाचिद्भोजो नगराद्बहिर्निर्गतो नूतनेन तटाकाम्भसा बाल्य- साधितकपालशोधनादि चकार। तन्मूलेन कश्चन शफरशावः कपालं प्रविष्टो विकटकरोटिकानिकटघटितो विनिर्गतः। ततो राजा स्वपुरीमवाप। तदारभ्य राज्ञः कपाले वेदना जाता।