भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

३७२ भोजप्रबन्धः तब प्रभात वेला में नगरी की ओर जाते राजा ने अस्ताचल श्रेणी में लटकते चंद्रविम्ब को देखकर कुतूहल पूर्वक सभा में आ उस समय निकटवर्ती कवियों का निरीक्षण करके एक समस्या पढ़ी--'चंद्र विम्ब लटक गया अस्ताचलभाल में।' तदा प्राह भवभूतिः-- 'अरुणकिरणजालैरन्तरिक्षे गतर्ते' तो भवभूति ने कहा-- 'नभ में रवि किरणों से सितारे मिट जाने पर' ततो दण्डी प्राह-- 'चलति शिशिरवाते मन्दमन्दं प्रभाते।' तब दंडी ने कहा-- 'मंद मंद शीत पवन बहते उपाकाल में।' ततः कालिदासः प्राह-- 'युवतिजनकदम्वे नाथमुक्तौष्ठबिम्बे चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं ललम्बे' । तदनंतर कालिदास ने कहा-- 'स्वामियों से नारियों के मुक्त होते ओष्ठबिम्ब चंद्रबिम्ब लटक गया अस्ताचल-भाल में।' ततो राजा सर्वानपि संमानितवान् । तत्र कालिदासं विशेषतः पूजितवान् । तब राजा ने सब कवियों का संमान किया और कालिदास की विशेष आराधना की। --: ० :-- ( ३४ ) रोगीराजा अथ कदाचिद्भोजो नगराद्बहिर्निर्गतो नूतनेन तटाकाम्भसा बाल्य- साधितकपालशोधनादि चकार। तन्मूलेन कश्चन शफरशावः कपालं प्रविष्टो विकटकरोटिकानिकटघटितो विनिर्गतः। ततो राजा स्वपुरीमवाप। तदारभ्य राज्ञः कपाले वेदना जाता।