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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

भोजप्रबन्धः १६५ ततः कविराह-- 'अम्बा कुप्यति न मया न स्नुषया सापि नाम्बया न मया । अहमपि न तया न तया वद राजन्कस्य दोषोऽयम्' ॥३०६॥ इति । राजा च दारिद्रयदोषं ज्ञात्वा कविं पूर्णमनोरथं चक्रे । तब कवि ने कहा-- माँ क्रोध करती है, पर न मुझ पर न अपनी पतोहू ( मेरी पत्नी ) पर; और वह ( मेरी पत्नी ) भी न माँ पर क्रोध करती है, न मुझ पर; और मैं न माँ पर क्रोध करता हूँ, न पत्नी पर; तो हे राजा, आप ही कहो कि यह दोष किसका है ? और राजा ने दरिद्रता का दोष समझा और कवि का मनोरथ पूर्ण कर दिया । ---: ० :--- ( २६ ) राज्ञः सर्वस्वदानम् एकदा द्वारपाल आगत्य राजानं प्राह--'देव, कविशेखरो नाम महाकविर्द्वारि वर्तते । राजा--'प्रवेशय' इत्याह । एक बार द्वारपाल आकर राजा से बोला--'महाराज, कवि शेखर नाम का महाकवि द्वार पर उपस्थित है ।' राजा ने कहा--प्रविष्ट कराओ ।' ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा पठति-- 'राजन्दौवारिकादेव प्राप्तवानस्मि वारणम् । मदवारणमिच्छामि त्वत्तोऽहं जगतीपते' ॥ ३५० ॥ तब कवि ने आकर स्वस्ति' कहा और पढ़ा-- हे राजा, वारण ( बाधा ) मुझे द्वारपाल से ही प्राप्त हो चुका है; हे जगत् के स्वामी, मैं तुम से मद युक्त वारण ( हाथी ) चाहता हूँ । तदा प्राङ्मुखस्तिष्ठन्नराजाऽतिसन्तुष्टस्तं प्राग्देशं सर्वं कवये दत्तं मत्वा दक्षिणाभिमुखोऽभूत् । ततः कविश्चिन्तयति--'किमिदम् । राजा मुखं परावृत्य मां न पश्यति' इति ।

१६६ भोजप्रबन्धः उस समय पूर्व की ओर (कवि की ओर) मुख करके बैठे राजा ने अत्यंत संतुष्ट हो 'पूर्व का संपूर्ण देश मैंने कवि को दे दिया'—यह मान लिया और दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ गया। तो कवि ने सोचा—'यह क्या है कि राजा मुँह फेर कर बैठ गया और मेरी ओर देखता भी नहीं?' ततो दक्षिणदेशे समागत्याभिमुखः कविः पठति-- 'अपूर्वेयं धनुर्विद्या भवता शिक्षिता कथम्। मार्गणौघः समायाति गुणो याति दिगन्तरम् ॥ ३११ ॥ ततो राजा दक्षिणदेशमपि मनसा कवये दत्त्वा स्वयं प्रत्यङ्मुखोऽभूत्। तब दक्षिण की ओर आ राजा के संमुख हो कवि ने पढ़ा--आपने यह अनोखी धनुर्विद्या कहाँ से सीखी है कि वाण-समूह तो आता है पर प्रत्यंचा (धनुष की डोरी) दूसरी ओर चली जाती है, अर्थात् मार्गणौघ (याचक समूह) के आते ही गुण (कृपा) दूसरी ओर हो जाती है। तो दक्षिण देश भी कवि को देने का मन में संकल्प कर राजा स्वयम् पश्चिम को मुख करके बैठ गया। कविस्तत्रागत्य प्राह-- 'सर्वज्ञ इति लोकोऽयं भवन्तं भाषते मृषा। पदमेकं न जानीषे वक्तुं नास्तीति याचके' ॥ ३१२ ॥ ततो राजा तमपि देशं कवेर्दत्तं मत्वोदङ्मुखोऽभूत्। कवि उधर आकर बोला-- आपको यह संसार व्यर्थ ही सर्वज्ञ कहता है; आप तो याचक से 'नहीं है' यह एक शब्द भी कहना नहीं जानते। तो राजा ने वह (पश्चिम) देश भी कवि को देकर उत्तर की ओर मुख कर लिया। कविस्तत्राप्यागत्य प्राह-- 'सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं कथ्यसे बुधैः। नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः' ॥ ३१३ ॥ ततो राजा स्वां भूमिं कविदत्तां मत्वोत्तिष्ठति स्म।

कवि वहाँ भी आकर बोला- विद्वान् लोग यह असत्य ही कहते हैं कि तुम सदा सब को सब कुछ दिया करते हो, न तो तुम्हारे शत्रुओं ने तुम्हारी पीठ पायी और न पर नारियों ने तुम्हारा वक्षःस्थल पाया । तो राजा अपनी सब धरती को दी मान कर उठ गया । कविश्च तदभिप्रायमज्ञात्वा पुनराह— 'राजन्कनकधाराभिस्त्वयि सर्वत्र वर्षति । अभाग्यच्छत्रसंछन्ने मयि नायान्ति बिन्दवः' ॥ ३१४ ॥ कवि ने राजा का अभिप्राय न समझ कर फिर कहा— हे राजा, सब स्थानों पर तुम्हारे स्वर्ण धाराओं की वर्षा करने पर भी अभाग्य के छाते से ढके मुझ पर बूँदें नहीं गिरतीं । तदा राजा चान्तःपुरं गत्वा लीलादेवीं प्राह-'देवि, सर्वं राज्यं कवये दत्तम्। तत्तपोवनं मया सहागच्छ' इति। अस्मिन्नवसरे विद्वान्द्वारि निर्गतः। बुद्धिसागरेण वृद्धामात्येन पृष्टः- 'विद्वन्, राज्ञा किं दत्तम्' इति। स आह-'न किमपि' इति। तदामात्यः प्राह- 'तत्रोक्तं श्लोकं पठ।' ततः कविः श्लोकचतुष्टयं पठति। अमात्यस्ततः प्राह-'सुकवे, तव कोटिद्रव्यं दीयते; परं राज्ञा यदद्य तव दत्तं भवति तत्पुनर्विक्रीयताम्' इति, कविस्तथा करोति। ततः कोटिद्रव्यं दत्त्वा कविं प्रेषयित्वामात्यो राजनकटमागत्य तिष्ठति स्म। तब राजा ने रनिवास में जाकर लीला देवी से कहा-'देवी, सारा राज्य कवि को दे दिया। सो मेरे साथ तपोवन चलो'। इसी अवसर पर विद्वान् द्वार पर निकल आया। बूढ़े मंत्री बुद्धिसागर ने पूछा-'हे विद्वान्, राजा ने क्या दिया?' वह बोला-'कुछ भी नहीं।' तो अमात्य ने कहा-'वहाँ पढ़े श्लोक पढ़ो।' तो कवि ने चारों श्लोक पढ़ दिये। तब मंत्री ने कहा-'हे सुकवि, तुम्हें एक करोड़ द्रव्य देता हूँ, पर राजा ने इस समय जो कुछ दिया है, उसे बेच दो।' कवि ने वैसा ही किया। तो कवि को एक करोड़ द्रव्य देकर भेज कर मंत्री राजा के पास जाकर बैठा।

१६८ •भोजप्रबन्धः तदा राजा च तमाह - 'बुद्धिसागर, राज्यमिदं सर्वं दत्तं कवये। पत्नीभिः सह तपोवनं गच्छामि। तत्र तपोवने तवापेक्षा यदि मया सहागच्छ' इति। ततोऽमात्यः प्राह- 'देव, तेन कविना कोटिद्रव्य- मूल्येन राज्यमिदं विक्रीतम्। कोटिद्रव्यं च विदुषे दत्तम्, अतो राज्यं भवदीयमेव। भुङ्क्ष्व' इति। तदा राजा च बुद्धिसागरं विशेषेण संमानितवान्। तब राजा ने उससे कहा-'बुद्धिसागर, यह सारा राज्य कवि को दे दिया। पत्नी सहित वन जा रहा हूँ। यदि वहाँ तपोवन में तुम्हें मेरे साथ की अपेक्षा हो तो मेरे साथ आओ।' तब मंत्री बोला--'महाराज, एक करोड़ द्रव्य मूल्य में उस कवि ने यह राज्य बेच दिया है और एक करोड़ द्रव्य विद्वान् को दे दिया गया है, इस लिए राज्य आपका ही है। भोग कीजिए।' तो राजा ने बुद्धिसागर का विशेष संमान किया। --:०:-- ( ३० ) तक्रविक्रीती युवती अन्यदा राजा मृगयारसेनाटवीमल्ललाटन्तपे तपने क्षूनदेहः पिपासापर्याकुलस्तुरगमारुह्योदकार्थी निकटतटभुवमटंस्तदलव्ध्वा परि- श्रान्तः कस्यचिन्महातरोरधस्तादुपविष्टः। तत्र काचिद्गोपकन्या सुकुमा- रमनोज्ञसर्वाङ्गा यदृच्छया धारानगरं प्रति तक्रं विक्रीतुकामा तक्रभाण्डं चोद्वहन्ती समागच्छति। तामागच्छन्तीं दृष्ट्वा राजा पिपासावशादेतद्भा- ण्डस्थं पेयं चेत्पिवामीति बुद्ध्यापृच्छत्--'तरुणि, किमावहसि' इति।' एक और वार राजा आखेट के शौक में जंगल में घूम रहा था; जब सूरज सिर को तपाने लगा तो खिन्न-दुःखी, प्यास से अत्यंत व्याकुल, जल के लिए घोड़े पर चढ़ निकटवर्त्ती तट भूमि में घूमते-फिरते जल को न पा, थक कर एक बड़े वृक्ष के नीचे जा बैठा। उधर एक सुकुमार और मनोहर सब अंगों वाली ग्वाले की कन्या अपनी इच्छा से माठा बेचने के निमित्त माठे का वरतन लिये धारा नगर की ओर जाती, चली आ रही थी। राजा ने उसे आती हुई देखकर प्यास के वश हो यह सोचा कि इसके वरतन में यदि कोई पीने की वस्तु हो तो पिऊँ और पूछा-'हे तरुणी, क्या ले जा रही हो?'

भोजप्रबन्धः १६६ ॥ च तन्मुखश्रिया भोजं मत्वा तत्पिपासां च ज्ञात्वा तन्मुखावलोकन- शाच्छन्दोरूपेणाह- 'हिमकुन्दशशिप्रभशङ्कनिभं परिपक्व कपित्थ सुगन्धरसम् । युवतीकरपल्लवनिर्मथितं पिव हे नृपराज रुजापहरम्' ॥३१५॥ इति । उसके मुख की कांति से उसने उसे भोज मानकर और उसकी प्यास को जानकर उसके मुख को देखने के लिए छंद रूप में कहा- बर्फ कुंद, चंदा और शंख के समान श्वेत, पके हुए कैथ का सुगंधित जैसे रस है, युवती के कोमल कर-किसलय से मथा हुआ पान करें राज-राज, सर्वरोगहर है। राजा तच्च तक्रं पीत्वा तुष्टस्तां प्राह--'सुभ्रूः, किं तवाभीष्टम्' इति । च किंचिदाविष्कृतयौवना मदपरवशमोहाकुलनयना प्राह-'देव, कन्यामेवावेहि ।' वह मीठा पीकर संतुष्ट हो राजा ने उससे कहा-'हे सुंदर भ्रुकुटी ने, तुम्हारी क्या कामना है?' जिसका यौवन कुछ-कुछ प्रकट हो था, ऐसी वह मद के परवश हो चंचल नेत्रों से मोह प्रकट करती हुई ने- 'महाराज, मुझे कुमारी कन्या ही समझें । सा पुनराह- 'इन्दुं कैरविणीव कोकपटलीवाम्भोजिनीवल्लभं मेघं चातकमण्डलीव मधुपश्रेणीव पुष्पव्रजम् । माकन्दं पिकसुन्दरीव रमणीवात्मेश्वरं प्रोषितं चेतोवृत्तिरियं सदा नृपवर त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते' ॥३१६॥ यथा कुमुदिनी शशि को चाहे, सूरज को मंडल चकवों का, झुंड पपीहों का बादल को, फूलों को समूह भ्रमरों का, आमों को कोयलिया, बिछुड़ा अपना पति रमणी को वांछित, मनोवृत्ति यह सदा नृपतिवर, तुम्हें देखने को उत्कंठित । राजा चमत्कृतः प्राह-'सुकुमारि, त्वां लीलादेव्या अनुमत्यास्वीकुर्मः।' इति धारानगरं नीत्वा तां तथैव स्वीकृतवान् ।

१७० भोजप्रबन्धः चमत्कृत हो राजा ने कहा—'हे सुकुमारी तुम्हें लीलादेवी की अनुमति से स्वीकारूँगा।' और उसे धारा नगरी ले जाकर उसी प्रकार स्वीकारा। —: o :— ( ३१ ) विलक्षणसमस्यापूर्तिः कदाचिद्राजाभिषेके मदनशरपीडिताया मदिराक्ष्याः करतलगलितो- हेमकलशः सोपानपङ्क्तिषु रटन्नध पपात । ततो राजा सभायामागत्य- कालिदासं प्राह--'सुकवे, एनां समस्यां पूरय--'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।' किसी समय राजा के स्नान के अवसर पर काम बाण से पीड़ित मदमाते नयनों वाली तरुणी की हथेली से छूटा सोने का कलसा सीढ़ियों पर टकराता गिर गया। तो राजा ने सभा में आकर कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस समस्या की पूर्ति करो—'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।' ततः कालिदासः प्राह-- 'राजाभिषेके मदविह्वलाया हस्ताच्च्युतो हेमघटो युवत्याः। सोपानमार्गे प्रकरोति शब्दं टटंटटंटंटटंटंटंटम् ॥ ३१७ ॥ तदा राजा स्वाभिप्रायं ज्ञात्वाक्षरलक्षं ददौ। तो कालिदास ने कहा— नृप के नहाते मद विह्वला के कर से छूटा स्वर्णकलश युवति के, करने लगा शब्द सुसीढ़ियों पर टटंटटंटंटटंटंटंटंटंटम्। तब राजा ने अपना अभिप्राय समझकर प्रत्यक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं। —: o :— ( ३२ ) चौरो मुककुण्डः कविः अन्यदा सिंहासनमलंकुर्वाणे श्रीभोजे कश्चिच्चौर आरक्षकै राज- निकटं नीतः। राजा तं दृष्ट्वा 'कोऽयम्' इत्यपृच्छत्। तदा रक्षकः प्राह-- 'देव, अनेन कुम्भिलकेन कस्मिंश्चिद्वेश्यागृहे घातपातमार्गेण द्रव्या- ण्यपहृतानि' इति। तदा राजा प्राह--'अयं दण्डनीयः' इति। अन्य वार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर रखवाले एक चोर को राजा के निकट लाये। राजा ने उसे देखकर पूछा—'यह कौन है?' तो

भोजप्रबन्धः १७१ रखवाला बोला—'महाराज, इस चोर ने एक वेश्या के घर में सेंध के रास्ते से द्रव्य चुराये हैं।' तो राजा ने कहा--'इसे दंड दो।' ततो भुक्कुण्डो नाम चौरः प्राह— 'भट्टिर्नष्टो भारवीयोऽपि नष्टो भिक्षुर्नष्टो भीमसेनोऽपि नष्टः। भुक्कुण्डोऽहं भूपतिस्त्वं हि राजन्भोभापङ्क्तावन्तकः संनिविष्टः।३१६॥ तो भुक्कुंड नाम का चोर बोला— नष्ट हुआ भट्टि, भारवीय भी विनष्ट हुआ नष्ट, भीमसेन भी विनष्ट है, भुक्कुंड मैं हूँ और तू है भूपति भोज 'भा-भा' की पंक्ति में यमराज संनिविष्ट है। तदा राजा प्राह--'भो भुक्कुण्ड, गच्छ गच्छ यथेच्छं विहर।' तो राजा ने कहा--अरे भुक्कुंड, जा भाग, यथेच्छया विहार करता रह।' --: ० :-- ( ३३ ) कविसत्कारः कदाचिद्द्रोजो मृगयापर्याकुलो वने विचरन्विश्रमाविष्टहृदयः कञ्चित्तटाकमासाद्य स्थितवान्श्रममाप्तसुप्तः । ततोऽपरपयोनिधिकुहरं गते भास्करे— तत्रैवारोचत निशा तस्य राज्ञः सुखप्रदा। चञ्चच्चन्द्रकरानन्द संदोहपरिकन्दला ॥३१६ ॥ कभी मृगया में व्यस्त भोज वन में विचरण करते हुए विश्राम करने की इच्छा से किसी तालाब पर पहुँच जा बैठा और श्रम के कारण सो गया। तब सूर्य के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर वहीं चमकते चंद्रमा की किरणों के आनंद से परिपूर्ण सुखदायिनी रात राजा को अच्छी लगी। ततः प्रत्यूषसमये नगरीं प्रति प्रस्थितो राजा चरमगिरिनितम्ब- लम्बमानशशाङ्कविम्बमवलोक्य सकुतूहलः सभामागत्य तदा समीप- स्थान्कवीन्द्रान्निरीक्ष्य समस्यामेकामवदत्--'चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं ललम्बे।'

३७२ भोजप्रबन्धः तब प्रभात वेला में नगरी की ओर जाते राजा ने अस्ताचल श्रेणी में लटकते चंद्रविम्ब को देखकर कुतूहल पूर्वक सभा में आ उस समय निकटवर्ती कवियों का निरीक्षण करके एक समस्या पढ़ी--'चंद्र विम्ब लटक गया अस्ताचलभाल में।' तदा प्राह भवभूतिः-- 'अरुणकिरणजालैरन्तरिक्षे गतर्ते' तो भवभूति ने कहा-- 'नभ में रवि किरणों से सितारे मिट जाने पर' ततो दण्डी प्राह-- 'चलति शिशिरवाते मन्दमन्दं प्रभाते।' तब दंडी ने कहा-- 'मंद मंद शीत पवन बहते उपाकाल में।' ततः कालिदासः प्राह-- 'युवतिजनकदम्वे नाथमुक्तौष्ठबिम्बे चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं ललम्बे' । तदनंतर कालिदास ने कहा-- 'स्वामियों से नारियों के मुक्त होते ओष्ठबिम्ब चंद्रबिम्ब लटक गया अस्ताचल-भाल में।' ततो राजा सर्वानपि संमानितवान् । तत्र कालिदासं विशेषतः पूजितवान् । तब राजा ने सब कवियों का संमान किया और कालिदास की विशेष आराधना की। --: ० :-- ( ३४ ) रोगीराजा अथ कदाचिद्भोजो नगराद्बहिर्निर्गतो नूतनेन तटाकाम्भसा बाल्य- साधितकपालशोधनादि चकार। तन्मूलेन कश्चन शफरशावः कपालं प्रविष्टो विकटकरोटिकानिकटघटितो विनिर्गतः। ततो राजा स्वपुरीमवाप। तदारभ्य राज्ञः कपाले वेदना जाता।

भोजप्रबन्धः १७३ एक बार भोज नगर से बाहर निकला और नये तालाब के पानी से बचपन से सिद्ध कपाल-शुद्धि आदि की क्रिया की। ताल के नीचे से एक मछली का बच्चा राजा के कपाल में घुस गया और टेढ़ी नस के निकट कृमि छोड़कर बाहर निकल गया। फिर राजा अपनी पुरी में आगया। तब से राजा के कपाल में पीडा होने लगी। ततस्तत्रत्यैर्भिषग्वरैः सम्यक्चिकित्सितापि न शान्ता। एवमहर्निशं नितरामस्वस्थे राज्यमानुषविदितेन महारोगेण। क्षामं क्षाममभूद्वपुर्गतसुखं हेमन्तकालेऽब्जव- द्वक्त्रं निर्गतकान्ति राहुवदनाक्रान्ताब्जबिम्बोपमम्। चेतः कार्यपदेषु तस्य विमुखं क्लीवस्य नारीष्विव व्याधिः पूर्णतरो बभूव विपिने शुष्के शिखावानिव ॥३२१॥ वह पीडा वहाँ के अच्छे चिकित्सकों के द्वारा भली भाँति चिकित्सा करने पर भी दूर न हुई। इस प्रकार मनुष्यों को अज्ञात महारोग से राजा के दिन रात निरंतर अस्वस्थ रहने पर— सुख-चैन न मिलने से राजा का शरीर अत्यंत क्षीण और मुख हेमंत ऋतु में कमल के समान अभद्र, कांतिहीन, राहु के मुख में पड़े चंद्रबिम्ब के सदृश हो गया। जैसे नपुंसक स्त्रियों से विमुख रहता है, वैसे ही उसका चित्त राज- काज से विमुख रहने लगा और जैसे सूखे जंगल में आग फैल जाती है, वैसे ही रोग पूरी तरह फैल गया। एवमतीते संवत्सरेऽपि काले न केनापि निवारितस्तद्गदः। ततः श्रीभोजो नानाविधसमानौषधग्रसनरोगदुःखितमनाः समीपस्थं शोक- सागरनिमग्नं बुद्धिसागरं कथमपि संयुताक्षरामुवाच वाचम्—'बुद्धिसा- गर, इतः परमस्मद्विषये न कोऽपि भिषग्वरो वसतिमातनोतु। बाहटादि- भेषजकोशान्निखिलान्स्रोतसि निरस्यागच्छ। मम देवसमागमसमयः समागतः, इति। तच्छ्रुत्वा सर्वेऽपि पौरजनाः कवयश्चावरोधसमाजश्च विगलदस्त्रासारनयना बभूवु। इस प्रकार एक वर्ष का समय बीत जाने पर भी किसी से उसका रोग दूर न हुआ। तब अनेक प्रकार की एक जैसी औषधों के सेवन और रोग से

दुःखी मनवाले श्री भोज ने निकट बैठे शोक के समुद्र में डूबे बुद्धिसागर से किसी प्रकार भरे स्वर में कहा—'बुद्धिसागर, अब के वाद कोई चिकित्सक हमारे राज्य में न रहे। वाहूट आदि के रचे सब ओषधि कोष ग्रन्थों को नदी में बहा आओ। मेरा देवों से समागम का समय (मृत्युकाल) आ गया।' यह सुनकर सभी नगरवासी, कवि और अंतःपुर के निवासी जन आँखों से आँसुओं की धाराएँ बहाने लगे।

ततः कदाचिद्देवसभायां पुरन्दरः सकलमुनिवृन्दमध्यस्थं वीणामुनि- माह—'मुने' इदानीं भूलोके का नाम वार्त्ता' इति। ततो नारदः प्राह— 'सुरनाथ, न किमप्याश्चर्यम्। किंतु धारानगरवासी श्रीभोजभूपालो रोगपीडितो नितरामस्वस्थो वर्तते। स तस्य रोगः केनापि न निवारितः। तदनेन भोजन्नृपालेन भिषग्वरा अपि स्वदेशान्निष्कासिताः। वैद्यशास्त्र- मप्यनृतमिति निरस्तम्' इति।

तब फिर कभी देव सभा में सब मुनियों की मंडली के मध्य में स्थित वीणाधारी मुनि नारद से इंद्र ने कहा—'हे मुनि, आजकल भूलोक का क्या समाचार है?' तो नारद ने कहा—'देवराज, कोई विचित्र बात नहीं है, किंतु धारा नगर का निवासी श्रीभोज राजा रोग से पीड़ित अत्यंत अस्वस्थ है। उसका रोग किसी से दूर नहीं हो पाया। सो उन भोजनरपाल ने अच्छे- अच्छे चिकित्सक भी अपने देश से निकाल दिये हैं। वैद्य शास्त्र भी झूठा है, सो प्रसिद्ध कर दिया है।

एतदाकर्ण्य पुरुहूतः समीपस्थौ नासत्याविदमाह—'भोः स्वर्विद्यौ, कथममृतं धन्वन्तरीयं शास्त्रम्।' तदा तावाहतुः - 'अमरेश देव, न व्यलीकमिदं शास्त्रम्। किंन्वमरविदितेन रोगेण बाध्यतेऽसौ भोजः' इति। इन्द्रः—'कोऽसाववार्यरोगः किं भवतोर्विदितः'। ततस्तावूचतुः—'देव' कपालशोधनं कृतं भोजेन, तदा प्रविष्टः पाठीनः। तन्मूलोऽयं रोगः' इति। तदेन्द्रः स्मयमानमुखः प्राह—'तदिदानीमेव युवाभ्यां गन्तव्यम्। न चेदितःपरं भूलोके भिषक्शास्त्रस्यासिद्धिर्भवेत्। स खलु सरस्वतीविलासस्य निकेतनं शास्त्राणामुद्धर्त्ता च' इति।

भोजप्रबन्धः १७५ यह सुनकर इंद्र ने निकट स्थित अश्विनी कुमारों से कहा—'हे स्वर्ग के वैद्यों क्या धन्वंतरि का शास्त्र (आयुर्वेद) असत्य है?' तो वे बोले—'हे देवराज महाराज, यह शास्त्र झूठा नहीं है, किंतु भोज ऐसे रोग से ग्रस्त है, जिसका ज्ञान देवों को ही है।' इंद्र ने कहा—'यह कौन-सा असाध्य रोग है, क्या आप दोनों को ज्ञात है?' तो उन दोनों ने कहा—'देव भोज ने कपाल- शोधन किया था, तभी एक मछली का बच्चा घुस गया। इस रोग की जड़ में वही है।' तो मुस्कराते हुए इंद्र ने कहा—'तो आप दोनों शीघ्र जाओ, नहीं तो अद्य से भूलोक में भिषक्-शास्त्र मिथ्या सिद्ध हो जायेगा। राजा भोज सरस्वती की विलासलीला का निकेतन और शास्त्रों का उद्धारक कर्ता है।' ततः सुरेंद्रादेशेन तावुभावपि धृतद्विजन्मवेषौ धारानगरं प्राप्य द्वारस्थं प्राहुतुः—'द्वारस्थ, आवां भिषजौ काशीदेशादागतौ। श्रीभोजाय विज्ञापय। तेनानृतमित्यङ्गीकृतं वैद्यशास्त्रमिति श्रुत्वा तत्प्रतिष्ठापनाय तद्रोगनिवारणाय च' इति। ततो द्वारस्थः प्राह--'भो विप्रौ, न कोऽपि भिषक्प्रवरः प्रवेष्टव्य इति राज्ञोक्तम्। राजा तु केवलमस्वस्थः। नायम- वसरो विज्ञापनस्य' इति। तस्मिन्क्षणे कार्यवशाद्बहिर्निर्गतो बुद्धिसाग- रस्तौ दृष्ट्वा 'कौ भवन्तौ' इत्यपृच्छत्। ततस्तौ यथागतमूचतुः। ततो बुद्धिसागरेण तौ राज्ञः समीपं नीतौ। तो सुरराज के आदेश से वे दोनों ब्राह्मण का वेष-धारण करके धारानगरी पहुँच कर द्वारपाल से बोले—'हे द्वारपाल, हमदोनों काशी देश से आये वैद्य हैं। श्री भोज को सूचना दो। उन्होंने यह मान लिया है कि वैद्यशास्त्र मिथ्या है; हम यह सुनकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा करने और उनका रोग दूर करने आये हैं।' तो द्वारपाल बोला—'ब्राह्मणो, राजा ने कहा है कि किसी वैद्यवर को भीतर मत भेजो। राजा तो बस अस्वस्थ हैं, सूचना देने का यह अवसर नहीं है।' उसी क्षण किसी कार्य के वश बाहर आये बुद्धिसागर ने उन्हें देखकर पूछा—'आप दोनों कौन हैं?' तो उन्होंने जैसा पहिले कहा था, बता दिया। तो बुद्धिसागर उन दोनों को राजा के पास ले गया। ततो राजा ताववलोक्य मुखश्रियाऽमानुषाविति बुद्ध्वा 'आभ्यां शक्यतेऽयं रोगो निवारयितुम्' इति निश्चित्य तौ बहु मानितवान्।

१७६ भोजप्रबन्धः ततस्तावूचतुः-‘राजन्, न भेतव्यम्। रोगो निर्गतः। किंतु कुत्रचिदेकान्ते त्वया भवितव्यम्’ इति। ततो राजापि तथा कृतम्। तो राजाने उन दोनों को देखा और उनके मुख की कांति से उन्हें ‘मनुष्य से भिन्न समझ कर वह इस निश्चय पर पहुँचा कि इन दोनों से इस रोग का निवारण हो सकता है और उनका उसने बहुत संमान किया। तो वे दोनों बोले--‘राजन्, भय मत कीजिए। रोग चला गया, किंतु कहीं आप एकांत में हो जायें।' तो राजा ने वैसा ही किया। ततस्तावपि राजानं मोहचूर्णेन मोहयित्वा शिरःकपालमादाय तत्करोटिकापुटे स्थितं शफरकुलं गृहीत्वा कस्मिंश्चिद्भाजने निक्षिप्य संधानकरणया कपालं यथावदारचय्य संजीवन्या च तं जीवयित्वा तस्मै तद्दर्शयताम्। तदा तद्दृष्ट्वा राजा विस्मितः ‘किमेतत्’ इति तौ पृष्टवान्। तदा तावूचतुः—‘राजन् त्वया बाल्यादारभ्य परिचितकपालशोधनतः संप्राप्तमिदम्’ इति। तो उन दोनों ने भी राजा को बेसुध करने वाले चूर्ण से बेसुध करके सिर का कपाल ले उसकी नस के पुट में स्थित मछलियों को निकाल कर एक बरतन में रखा और संधि जोड़ने की क्रिया से कपाल को यथापूर्व करके और संजीवनी से राजा को चैतन्य करके उसे वे मछलियाँ दिखायीं। तब उन्हें देखकर विस्मित हुए राजा ने उनसे पूछा--‘यह क्या है?’ तो वे दोनों बोले--‘हे राजा, बचपन से लेकर जाने-बूझे कपाल-शोधन से तुमने इन्हें प्राप्त किया है।' ततो राजा तावश्विनौ मत्वा तच्छोधनार्थमपृच्छत्—‘किमस्माकं पथ्यम्’ इति। ततस्तावूचतुः— ‘अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं वराः स्त्रियः। एतद्धो मानुषाः पथ्यम्--इति। तो राजा ने उन दोनों को अश्विनी कुमार मानकर रोग ठीक करने की इच्छा से पूछा--‘हमारा पथ्य क्या है?’ तो वे दोनों बोले-- ‘उष्ण जल से स्नान, दुग्ध का पान, सुगढ़ नारीजन, यही तुम्हारा पथ्य मानुषों—

तत्रान्तरे राजा मध्ये 'मानुषाः' इति संबोधनँ श्रुत्वा 'वयं चेन्मानुषाः, कौ युवाम्' इति तयोर्हस्तौ झटिति स्वहस्ताभ्यामग्रहीत् । ततस्तत्क्षणएव तावन्तर्द्धानं ब्रुवन्तावेव 'कालिदासेन पूरणीयं तुरीयचरणम्' इति । ततो राजा विस्मितः सर्वानाहूय तद्वृत्तमब्रवीत् । तच्छ्रुत्वा सर्वेऽपि चम- त्कृता विस्मिताश्च बभूवुः । इस कथन के बीच राजा ने 'मानुषों' यह संबोधन सुनकर कहा- 'यदि हम मानुष हैं तो तुम दोनों कौन हो'—और झट से अपने हाथों से उन दोनों के दोनों हाथों को पकड़ लिया। तो वे दोनों 'चौथे चरण की पूर्ति कालिदास द्वारा होगी', कहते हुए उसी क्षण अंतर्धान होगये । तो विस्मित हुए राजा ने सब को बुलाकर वह हाल कहा। उसे सुनकर सभी चमत्कृत और विस्मित हुए। ततः कालिदासेन तुरीयचरणं पूरितम्— 'स्निग्धमुष्णं च भोजनम्' ॥ ३२२ ॥ इति। ततो भोजोऽपि कालिदासं लील‍ामानुषं मत्वा परं सम्मानितवान्। अथ राजनृपालः प्रतिदिनं संजातबलकान्तिर्ववृधे धाराधीशः कृष्णेतरपक्षे चन्द्र इव । तो कालिदास ने चौथा चरण पूरा किया— 'चिकना गरम-गरम भोजन।' तो भोज ने भी कालिदास को लीला मानुष (मनुष्य की लीला करनेवाला देव) मानकर परम संमान किया । तदनंतर धारा के अधीश्वर नृपाल भोज बल और कांति पाकर उसी प्रकार स्वास्थ्य वृद्धि को प्राप्त करने लगे जिस प्रकार कि उजाले पाख में चंद्रमा बढ़ता है। (३५) गाथासनाथा वीठिका ततः कदाचित्सिंहासनमलंकुर्वाणे श्रीभोजे कालिदास-भवभूति-दण्डि- बाण-मयूर-वररुचि-प्रभृतिकवितिलककुलालंकृतायां सभायां द्वारपाल १२ भो०

१७८ •भोजप्रबन्धः एत्याह-'देव, कश्चित्कविर्द्वारि तिष्ठति। तेनेयं प्रेषिता गाथासनाथा चीठिका देवसभायां निक्षिप्यताम्' इति तां दर्शयति। फिर कभी श्रीभोज के सिंहासन सुशोभित करने पर कालिदास, भवभूति, दंडी, बाण, मयूर, वररुचि आदि कवियों के तिलक स्वरूप कवि कुल से अलंकृत सभा में द्वारपाल आकर बोला—'महाराज, कोई कवि द्वार पर उपस्थित हैं। उसने इस गाथा के साथ महाराज की सभा में देने के लिए यह चीठी भेजी है।' यह कहकर उसने पत्रिका दिखायी। राजा गृहीत्वा तां वाचयति— 'काचिद्वाला रमणवसतिं प्रेषयन्ती करण्डं दासीहस्तात्सभयमलिखद्व्यालमन्योपरिस्थम्। गौरीकान्तं पवनतनयं चम्पकं चात्र भावं पृच्छत्यार्यो निपुणतिलको मल्लिनाथः कवीन्द्रः'॥३२३॥ राजा ने लेकर पढ़ा— एक नव युवती ने अपने प्रियतम के पास दासी के हाथ एक कंडी (बांस की पिटारी) भेजते हुए उसके ऊपर डरते-डरते एक सर्प बना दिया और गौरी पति शिव, पवन पुत्र हनूमान् और चंपा का फूल—ये सब भी बना दिये; तो चतुरों में तिलक समान (श्रेष्ठ) कविराज आर्य मल्लिनाथ पूछता है कि इसका भाव क्या है? तच्छ्रुत्वा सर्वापि विद्वत्परिषच्चमत्कृता। ततः कालिदास प्राह-'राजन्, मल्लिनाथः शीघ्रमाकारयितव्यः' इति। ततो राजादेशाद्द्वारपालेन स प्रवेशितः कवी राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः। उसे सुन सारी विद्वन्मंडली चमत्कृत हो गयी। तो कालिदास ने कहा— 'हे राजन्, मल्लिनाथ को शीघ्र बुलवाइए।' तो फिर राजा की आज्ञा से द्वारपाल-द्वारा भीतर भेजा गया वह कवि राजा के प्रति 'मंगल हो' यह कह कर उसकी आज्ञा से बैठ गया। ततो राजा प्राह तं कवीन्द्रम्—'विद्वन्मल्लिनाथकवे, साधु रचिता गाथा।' तदा कालिदासः प्राह—'किमुच्यते साध्विति। देशान्तरगत-

कान्तायाश्चारित्र्यवर्णनेन श्लाघनीयोऽसि विशिष्य तत्तद्भावप्रतिभट- वर्णनेन।' तब राजा ने उस कविराज से कहा-'हे विद्वान् मल्लिनाथ कवि, आपने अच्छी गाथा रची।' तो कालिदास ने कहा- केवल अच्छी गाथा क्या कहते हैं-देशांतर (अन्य स्थान) में पड़ी (विरहिणी) प्रिया के चरित्र का वर्णन करने से, विशेषरूप में प्रत्येक भाव के विरोधी का वर्णन कर देने से कवि प्रशंसा पाने योग्य है।' [टिप्पणी-चंपा का फूल युवती के निर्मल चरित्र का प्रतीक है, जिसके पास इधर-उधर रस के लोभ में भनभनाते भौंरे-सदृश विलासी फटक भी नहीं सकते; सर्प चरित्र रूपी धन का प्रहरी है; शिव कामजयी हैं अर्थात् युवती के चित्त में काम-विकार उत्पन्न होते ही मिट जाते हैं; हनुमान् रावण की वाटिका के विध्वंसक और सीता का समाचार राम तक पहुँचाने वाले हैं, सो वह राक्षसों के बीच रहकर भी अपने चरित्र की रक्षा कर रही हैं-यह संदेश और समाचार हनुमान् जी ले जा रहे हैं, इसका प्रतीक हनुमान का चित्र है।] तदा भवभूतिः प्राह- 'विशिष्यत इयं गाथा पङ्क्तिकण्ठोद्यानवैरिणो वातात्मजस्य वर्णनात्' इति। तब भवभूति ने कहा-दशकंठ रावण की वाटिका के वैरी पवन पुत्र के वर्णन से यह गाथा विशिष्ट होगयी है। ततः प्रीतेन राज्ञा तस्मै दत्तं सुवर्णानां लक्षम् पञ्च गजाश्च दश तुरगाश्च दत्ताः। तब प्रसन्न हो राजा ने उसे लाख-भर सोना, पांच हाथी और दस घोड़े दिये। ततः प्रीतो विद्वान्स्तौति राजानम्- 'देव भोज तव दानजलौधैः सेयमद्य रजनीति विशङ्के। अन्यथा तद्बुद्धितेषु शिलागोभूरुहेषु कथमीदृशदानम्' ॥ ३२४॥ तब प्रसन्न होकर विद्वान् ने राजा की स्तुति की- 'हे महाराज भोज, आपके दान रूपी जलप्लावन के कारण आज भी वही प्रलय रात्रि शेष है, ऐसी प्रतीति मुझे हो रही है; अन्यथा (प्रलयरात्रि

१८० भोजप्रबन्धः

बीत जाने पर समुद्र में से ) उन सब प्रसिद्ध शिला चिंतामणि, गाय कामधेनु और पेड़ कल्पवृक्ष के निकल जाने पर ऐसा विलक्षण दान कैसे संभव होता ? ततो लोकोत्तरं श्लोकं श्रुत्वा राजा पुनरपि तस्मै लक्षत्रयं ददौ । ततो लिखति स्म भाण्डारिको धर्मपत्रे- 'प्रीतः श्रीभोजभूपः सदसि विरहिणो गूढनमौक्तिपद्यं श्रुत्वा हेम्नां च लक्षं दश वरतुरगान्पञ्च नागांनयच्छत्। पश्चात्तत्रैव सोऽयं वितरणगुणसङ्कीर्त्तनात्प्रोतचेता लक्षं लक्षं च लक्षं पुनरपि च ददौ मल्लिनाथाय तस्मै' ॥३२५॥ तो ऐसा लोकोत्तर (दिव्य) श्लोक सुनकर राजा ने फिर उसे तीन लाख मुद्राएँ दीं। तब भंडारी ने धर्मपत्र पर लिखा- सभा में विरही के प्रति गूढ संकेत कथन से पूर्ण पद्य सुनकर प्रसन्न हुए श्रीभोज ने लाख-भर सोना, दस अच्छे घोड़े और पाँच हाथी दिये। तत्पश्चात् वहीं दान करने के गुण का सुंदर वर्णन करने पर उस मल्लिनाथ को प्रसन्न चित्त राजा ने फिर लाख, लाख और लाख (अर्थात् तीन लाख) मुद्राएँ दीं। ( ३६ ) राज्ञश्चरमगीतिः ततः कदाचिद्भोजराजः कालिदासं प्रति प्राह-'सुकवे, त्वमस्माकंचर- मग्रन्थं पठ।' ततः क्रुद्धो राजानं विनिन्द्य कालिदासः द्वारेण तं देशं त्यक्त्वा विलासवत्या सहैकशिलानगरं प्राप। कभी भोजराज ने कालिदास से कहा- 'हे सुकवि, तुम हमारे मरणकाल का विवरण देने वाली (मरणगीत) रचना पढ़ो।' तो राजा की निंदा करके क्रुद्ध हो कालिदास विलासवती के साथ एकशिला नगर को चला गया। ततः कालिदासवियोगेन शोकाकुलस्तं कालिदासं मृगयितुं राजा कापालिकवेषं धृत्वा क्रमेणैकशिलानगरं प्राप। ततः कालिदासो योगिनं दृष्ट्वा तं सामपूर्वं पप्रच्छ-'योगिन्, कुत्र तेऽस्ति स्थितिः' इति।

'भोजप्रबन्धः १८१

तत्पश्चात् कालिदास के वियोग में शोक से व्याकुल राजा उस कालिदास को खोजने के लिए कापालिक का वेष धरकर यथा क्रम एकशिला नगर पहुँचा । तो कालिदास ने योगी को देखकर उससे संमानपूर्वक पूछा—'योगीजी, आपका स्थान कहाँ है ?' योगी वदति—'सुकवे, अस्माकं धारानगरे वसतिः' इति । योगी ने कहा—हे सुकवि, हमारा निवासस्थान धारा नगरी है ।' ततः कविराह—'तत्र भोजः कुशली किम् ?' तो कवि ने पूछा—'वहां भोज सकुशल हैं ?' ततो योगी प्राह—'किं मया वक्तव्यम्' इति । तो योगी ने कहा—'मैं क्या कहूँ ?' ततः कविराह—'तत्रातिशयवार्तास्ति चेत्सत्यं कथय' इति । तो कवि ने कहा—'वहाँ यदि कोई विशेष बात हो तो सच सच बताइए ।' तदा योगी प्राह—'भोजो दिवं गतः' इति । तब योगी ने कहा—'भोज स्वर्ग चला गया ।' ततः कविर्भूमौ निपत्य प्रलपति—'देव, त्वां विनास्माकं क्षणमपि भूमौ न स्थितिः । अतस्त्वत्समीपमहमागच्छामि' इति कालिदासो क्षणं विलप्य चरमश्लोकं कृतवान्— 'अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती । पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते' ॥ ३२६ ॥ तो धरती पर पछाड़ खाकर कवि विलाप करने लगा—'महाराज, आपके विना धरती पर हम क्षण भर भी नहीं रह सकते; इसलिए मैं आपके पास आता हूँ ।' इस प्रकार कालिदास ने बहुत-सा विलाप करके मरण श्लोक रचा— आज धारा का नहीं आधार, शारदा का है नहीं अवलंब, हुए खंडित आज पंडित लोग, भोजराज चले गये स्वर्लोक । एवं यदा कविना चरमश्लोक उक्तस्तदैव स योगी भूतले विसंज्ञः पपात । ततः कालिदासस्तथाविधं तमवलोक्य 'अयं भोज एव' इति निश्चित्य

१८२ भोजप्रबन्धः 'अहह महाराज, तत्रभवताहं वञ्चितोऽस्मि' इत्यभिधाय झटिति तं श्लोकं प्रकारान्तरेण पपाठ-- इस प्रकार ज्योंही कवि ने मरणश्लोक पढ़ा, त्योंही वह योगी बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ा। तो उसे बेसुध देखकर कालिदास को निश्चय हो गया कि यह भोज ही है; और 'अहा महाराज, श्रीमान् ने ने मुझे धोखे में डाल दिया', यह कह झट से श्लोक को दूसरे प्रकार से पढ़ दिया-- 'अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती । पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवं गते' ॥ ३२७ ॥ ततो भोजस्तमालिङ्ग्य प्रणम्य धारानगरं प्रति ययौ । आज धारा का सुजन आधार, शारदा का है सुजन अवलंब, हुए मंडित आज पंडित लोग, भोजराज विराजते भूलोक । तदनंतर भोज उसका आलिंगन कर प्रणाम करके धारानगरी को गया । शैले शैलविनिश्चलं च हृदयं मुञ्जस्य तस्मिन्क्षणे भोजे जीवति हर्षसंचयसुधाधाराम्बुधौ मज्जति । स्त्रीभिः शीलवतीभिरेव सहसा कर्तुं तपस्तत्परे मुञ्जे मुञ्चति राज्यभारमभजत्यागैश्च भोगैर्नृपः ॥३२८॥ उस काल (जब भोज के शिरच्छेद की आज्ञा दी थी) मुंज का हृदय पहाड़ पर पड़े पत्थर के समान अत्यंत निश्चल हो गया था; भोज के जीवित रह जाने पर वही हृदय जैसे विपुल हर्ष की अमृत धाराओं के समुद्र में स्नान करने लगा (मुंज अत्यंत प्रसन्न हुआ) । फिर अकस्मात् शीलवती रानियों के साथ तप करने को तत्पर मुंज के राज्यभार छोड़ देने पर राजा भोज ने त्याग और भोग-दोनों करते हुए उस राज्य का उपभोग किया । ॐ इति भोजप्रबन्धः समाप्तः ॐ

श्लोकानुक्रमणिका श्लोकः । श्लोकः । अकाण्डधृतमानसव्य २६७ अर्थिनी कवयति कवयति १११ अघटितघटितं घटयति १४४ अर्धं दानववैरिणा २४१ अङ्के केऽपि शशङ्किरे २५८ अवज्ञास्फुटितं प्रेम १३६ अतिदाक्षिण्ययुक्तानां १० अवमानं पुरस्कृत्य १२ अत्युद्धृता वसुमती २१६ अविदितगुणापि २४० अदातृमानसं क्वापि १३२ अविवेकमतिर्नृपति ५१ अद्य धारा निराधारा ३२६ अविवेकमतिर्नृपति १४० अद्य धारा सदाधारा ३२७ अशीतेनाम्भसा स्नानम् ३२२ अधरस्य मधुरिमाणं ८८ अश्वप्लुतं वासवगर्जितम् १४३ अनेके फणिनः सन्ति ३०० अष्टौ हाटककोटयः २३१ अपाङ्गपातैरुपदेश २७७ असूयया हतेनैव ६ अपूर्वैवं धनुर्विद्या ३११ अस्य श्रीमोजराज्यस्य १६२ अपूर्वो भाति भारत्याः ८६ अहो मे सौभाग्यं मम च २५३ अपृष्ठस्तु नरः किंचित् १६३ आकारमात्रविज्ञान ६१ अप्रगल्भस्य या विद्या ४८ आगतानामपूर्णानाम् ७२ अप्रार्थितानि दुःखानि १५७ आत्मायत्ते गुणग्रामे २२४ अफलानि दुरन्तानि १६ आदानस्य प्रदानस्य ११ अबलासु विलासिनो २४४ आपदर्थं धनं रक्षेत् १६८ अमूतप्राची पिङ्गा रस २६३ आपन्न एव पार्थ १७८ अम्बा कुप्यति न मया ३०६ आबद्धकृत्रिमसटा १७७ अम्भोजपत्रायतलोच २७८ आमोदैर्मरुतो मृगाः २३६ अम्भोधिः स्थलतां स्थलं ३१ आरनालगलदाहशङ्कया २५८ अयं मे वाग्गुम्फो ६६ आश्वस्य पर्वतकुलम् २८० अये लाजा उच्चैः पथि २३८ आसन्क्षीणा निय विन्ति २१० अरुणकिरणजाले ३२० इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि १४७ अर्था न सन्ति न च २८१ इतश्चेतश्चाङ्गिविघटित १८३

१८४ भोजप्रबन्धः श्लोकः । श्लोकः । इन्दुं कैरविणीन कोक ३१६ । काकाः किं किं न कुर्वन्ति १६२ इह निवसति मेहः ११३ । काचिद्बाला रमणवसतिम् ३२३ इहैव नरकव्याधे ३५ । का त्वं पुत्रि नरेन्द्र १८२ उचितमनुचितं वा कुर्वता २४ । कान्तोऽसि नित्यमधुरो २३५ उपकारश्चापकारो ४१ । कालिदास कलावास १५६ उपचारः कर्तव्यो याव ७८ । कालिदासकवेर्वाणी २४६ उपभोगकातराणां ११७ । काव्यं करोमि नहि ६४ उपस्थिते विप्लव एव १५५ । का सभा किं कविज्ञानं १६४ उरगी शिशवे बुभुक्षवे २६३ । किं कुप्यसि कस्मैचन ६६ ऊपरं कर्मसस्यानां क्षेत्रम् १०६ । किंचिद्वेदमयं पात्रं १०७ एक एव सुहृद्धर्मो ३२ । किं जातोऽसि चतुष्पथे २२६ एकमस्य परमेक १८८ । किं नु मे स्यादिदं कृत्वा २३ एकेन राजहंसेन १५२ । किं पौरुषं रक्षति १५३ एकोऽपि त्रय इव भाति २६८ । कियन्मानं जलं विप्र १८४ एतासामरविन्द ७५ । किसल्यानि कृतः २०६ एतेषु हा तरुणमारुत २०४ । कुमुदवनमपश्रि श्रीमद २७६ एते हि गुणाः पङ्कज ६७ । कूर्मः पाताल गङ्गापयस्त २२७ एषा धारेन्द्रपरिषत् २५० । कृतो यैर्न च वाग्मी च १०४ कङ्कणं नयनद्वन्द्वे १२३ । केचिन्मूलाकुलाशा २४३ कचभारात्कुचभारः २६० । क्रोडोद्याने नरेन्द्रेण २२८ कण्ठस्था या भवेद्विद्या ४ । क्रोधं मा कुरु मह्य १९६ कतिपयदिवासस्थायिनि ३६ । क्व जनकत नया क्व रामजाया ३०५ कलकण्ठ यथा शोभा २८७ । क्व नु कुलमकलङ्कमायताक्ष्याः ३०४ कलमाः पाकविनम्रा १७४ । क्षणमप्यनुगृह्णाति २४२ कवित्वं न शृणोत्येव १३० । क्षमी दाता गुणग्राही ६३ कविमतिरिव बहुलोहा ३०१ । क्षामं क्षामममूहृपु ३२१ कविषु वादिषु भोगिषु १८१ । क्षुत्क्षामाः शिशवः २१५ कवीनां मानसं नौमि ११२ । ख्यातिं गमयंति सुजनः १२६ कस्य तृपं न क्षपयसि ७३ । एतासामरविन्द ७५