भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ भोजप्रबन्धः 'अहह महाराज, तत्रभवताहं वञ्चितोऽस्मि' इत्यभिधाय झटिति तं श्लोकं प्रकारान्तरेण पपाठ-- इस प्रकार ज्योंही कवि ने मरणश्लोक पढ़ा, त्योंही वह योगी बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ा। तो उसे बेसुध देखकर कालिदास को निश्चय हो गया कि यह भोज ही है; और 'अहा महाराज, श्रीमान् ने ने मुझे धोखे में डाल दिया', यह कह झट से श्लोक को दूसरे प्रकार से पढ़ दिया-- 'अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती । पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवं गते' ॥ ३२७ ॥ ततो भोजस्तमालिङ्ग्य प्रणम्य धारानगरं प्रति ययौ । आज धारा का सुजन आधार, शारदा का है सुजन अवलंब, हुए मंडित आज पंडित लोग, भोजराज विराजते भूलोक । तदनंतर भोज उसका आलिंगन कर प्रणाम करके धारानगरी को गया । शैले शैलविनिश्चलं च हृदयं मुञ्जस्य तस्मिन्क्षणे भोजे जीवति हर्षसंचयसुधाधाराम्बुधौ मज्जति । स्त्रीभिः शीलवतीभिरेव सहसा कर्तुं तपस्तत्परे मुञ्जे मुञ्चति राज्यभारमभजत्यागैश्च भोगैर्नृपः ॥३२८॥ उस काल (जब भोज के शिरच्छेद की आज्ञा दी थी) मुंज का हृदय पहाड़ पर पड़े पत्थर के समान अत्यंत निश्चल हो गया था; भोज के जीवित रह जाने पर वही हृदय जैसे विपुल हर्ष की अमृत धाराओं के समुद्र में स्नान करने लगा (मुंज अत्यंत प्रसन्न हुआ) । फिर अकस्मात् शीलवती रानियों के साथ तप करने को तत्पर मुंज के राज्यभार छोड़ देने पर राजा भोज ने त्याग और भोग-दोनों करते हुए उस राज्य का उपभोग किया । ॐ इति भोजप्रबन्धः समाप्तः ॐ