भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

'भोजप्रबन्धः १८१

तत्पश्चात् कालिदास के वियोग में शोक से व्याकुल राजा उस कालिदास को खोजने के लिए कापालिक का वेष धरकर यथा क्रम एकशिला नगर पहुँचा । तो कालिदास ने योगी को देखकर उससे संमानपूर्वक पूछा—'योगीजी, आपका स्थान कहाँ है ?' योगी वदति—'सुकवे, अस्माकं धारानगरे वसतिः' इति । योगी ने कहा—हे सुकवि, हमारा निवासस्थान धारा नगरी है ।' ततः कविराह—'तत्र भोजः कुशली किम् ?' तो कवि ने पूछा—'वहां भोज सकुशल हैं ?' ततो योगी प्राह—'किं मया वक्तव्यम्' इति । तो योगी ने कहा—'मैं क्या कहूँ ?' ततः कविराह—'तत्रातिशयवार्तास्ति चेत्सत्यं कथय' इति । तो कवि ने कहा—'वहाँ यदि कोई विशेष बात हो तो सच सच बताइए ।' तदा योगी प्राह—'भोजो दिवं गतः' इति । तब योगी ने कहा—'भोज स्वर्ग चला गया ।' ततः कविर्भूमौ निपत्य प्रलपति—'देव, त्वां विनास्माकं क्षणमपि भूमौ न स्थितिः । अतस्त्वत्समीपमहमागच्छामि' इति कालिदासो क्षणं विलप्य चरमश्लोकं कृतवान्— 'अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती । पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते' ॥ ३२६ ॥ तो धरती पर पछाड़ खाकर कवि विलाप करने लगा—'महाराज, आपके विना धरती पर हम क्षण भर भी नहीं रह सकते; इसलिए मैं आपके पास आता हूँ ।' इस प्रकार कालिदास ने बहुत-सा विलाप करके मरण श्लोक रचा— आज धारा का नहीं आधार, शारदा का है नहीं अवलंब, हुए खंडित आज पंडित लोग, भोजराज चले गये स्वर्लोक । एवं यदा कविना चरमश्लोक उक्तस्तदैव स योगी भूतले विसंज्ञः पपात । ततः कालिदासस्तथाविधं तमवलोक्य 'अयं भोज एव' इति निश्चित्य