भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें.भोजप्रबन्धः २१
साथ होम की सामग्री भेज ।' सो राजाने यह कह कर बुद्धिसागर को भेज दिया कि कापालिक ने जो कहा है, वैसा ही सब करो । ततो रात्रौ गूढरूपेण भोजोऽपि तत्र नदीपुलिने नीतः । 'योगिना भोजो जीवितः' इति प्रथा च समभूत् । ततो गजेन्द्रारूढो वन्दिभिः स्तूयमानो भेरीमृदङ्गादिघोषैर्जगद्बधिरीकुर्वन्पौरामात्यपरिवृतो भोज- राजो राजभवनमगात् । राजा च तमालिङ्ग्य रोदिति । भोजोऽपि रुदन्तं मुञ्जं निवार्यस्तौषीत् । तदनंतर रात में गुप्त रूप से भोज भी नदी तट पर ले जाया गया । 'योगी द्वारा भोज जिला दिया गया है,' ऐसी प्रसिद्धि हो गयी । तत्पश्चात् गजराज पर चढ़ा, वंदियों द्वारा प्रशंसित होता, नगाड़े और मृदंग आदि के घोषों से संसार को बहिरा करता, नगरवासियों और मंत्रियों से घिरा भोज राज राजमहल में पहुँचा । राजा उसका आलिंगन करके रोने लगा । भोजने भी रोते हुए मुंज को चुपकार उसकी स्तुति की । ततः सन्तुष्टो राजा निजसिंहासने तस्मिन्निवेशयित्वा छत्रचामराभ्यां भूषयित्वा तस्मै राज्यं ददौ । निजपुत्रेभ्यः प्रत्येकमेकैकं ग्रामं दत्त्वा परमप्रेमास्पदं जयन्तं भोजानिकाशे निवेशयामास । ततः परलोकपरि- त्राणो मुञ्जोऽपि निजपट्टराज्ञीभिः सह तपोवनभूमिं गत्वा परं तपस्तेपे । ततो भोजभूपालश्च देवब्राह्मणप्रसादाद्राज्यं पालयामास । इति भोजराज्य राज्यप्राप्तिप्रबन्धः । तत्पश्चात् संतुष्ट हुए राजा ने अपने उस सिंहासन पर बैठा कर और छत्र- चामर (आदि राज चिह्नों) से सुशोभित कर उसे (भोज को) राज्य दे दिया । अपने प्रत्येक पुत्र को एक-एक गाँव देकर अपने सबसे प्रिय जयंत कुमार को राज भोज के निकट रख दिया । तदनंतर परलोक सुधारने की इच्छा करता मुंज भी अपनी पटरानियों सहित तपोवन भूमि में जाकर परम तप करने लगा । उसके बाद देवताओं और ब्राह्मणों के प्रसाद से राजा भोज राज्य का पालन करने लगा । राजा भोज को राज्य मिलने की कथा समाप्त । —:०:—