भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० भोजप्रबन्धः
ग्रामे ग्रामे कुटी रम्या निर्झरे निर्झरे जलम् । भिक्षायां सुलभं त्वान्नं विभवैः किं प्रयोजनम् ॥ ४६ ॥ देव, अस्माकं नैको देशः । सकलभूमण्डलं भ्रमामः । गुरूपदेशे तिष्ठामः । निखिलं भुवनतलं करतलामलकवत्पश्यामः । सर्पदष्टं विष- व्याकुलं रोगग्रस्तं शस्त्राभिपन्नशिरस्कं कालशिथिलितं तात, तत्क्षणादेव विगतसकलव्याधिसञ्चयं कुर्मः इति ।
योगी ने कहा-शिव के कल्याणकारीतत्त्वार्थ को जानने वाले योगी पुरुषों का प्रत्येक देश में घर है और प्रत्येक घर में ही भिक्षा का अन्न है और सरोवर और नदी में जल हैं । गांव-गांव में रमणीय कुटी है, प्रत्येक झरने में जल है, भिक्षा में अन्न सरलता से प्राप्य है; उन्हें ऐश्वर्यों से क्या प्रयोजन ! देव, हमारा एक देश नहीं है। समस्त भूमंडल में भ्रमण करते हैं। गुरु के उपदेश पर विश्वास करते हैं। संपूर्ण भुवनमंडल को हथेली पर धरे आँवले के समान देखते हैं। साँप के काटे, विष से छटपटाते, रोगी, शस्त्र द्वारा कटे सिर वाले, मौत से ठंडे पड़े को हे तात, हम क्षण भर में संपूर्ण रोगों से रहित कर देते हैं।
राजापि कुड्यन्तर्हित एव श्रुतसकलवृत्तान्तः सभामागतः कापा- लिकं दण्डवत्प्रणम्य, योगीन्द्र, रुद्रकल्प, परोपकारपरायण, महापा- पिना मया हतस्य पुत्रस्य प्राणदानेन मां रक्ष' इत्याह । अथ कापालिकोऽपि 'राजन्, मा भैषीः । पुत्रस्ते न मरिष्यति । शिवप्रसादेन गृहमेष्यति । परं श्मशानभूमौ बुद्धिसागरेण सह होमद्रव्याणि प्रेषय' इत्यवोचत् । ततो राजा 'कापालिकेन यदुक्तं तत्सर्वं तथा कुरु' इति बुद्धिसागरः प्रेषितः ।
ओट में खड़ा राजा भी समस्त वृत्तांत सुन कर सभा में आ गया और कापालिक को दंडवत् प्रणाम करके बोला- 'रुद्र के समान, परोपकार में लग्न योगिराज, मुझ महापापी द्वारा मार डाले गये पुत्र की रक्षा उसे प्राण देकर कीजिए।' कापालिक ने भी कहा- 'राजन्, मत डर । तेरा पुत्र नहीं मरेगा। शिव के प्रसाद से घर आयेगा। परंतु श्मशान भूमि में बुद्धिसागर के