भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
२० भोजप्रबन्धः
ग्रामे ग्रामे कुटी रम्या निर्झरे निर्झरे जलम् । भिक्षायां सुलभं त्वान्नं विभवैः किं प्रयोजनम् ॥ ४६ ॥ देव, अस्माकं नैको देशः । सकलभूमण्डलं भ्रमामः । गुरूपदेशे तिष्ठामः । निखिलं भुवनतलं करतलामलकवत्पश्यामः । सर्पदष्टं विष- व्याकुलं रोगग्रस्तं शस्त्राभिपन्नशिरस्कं कालशिथिलितं तात, तत्क्षणादेव विगतसकलव्याधिसञ्चयं कुर्मः इति ।
योगी ने कहा-शिव के कल्याणकारीतत्त्वार्थ को जानने वाले योगी पुरुषों का प्रत्येक देश में घर है और प्रत्येक घर में ही भिक्षा का अन्न है और सरोवर और नदी में जल हैं । गांव-गांव में रमणीय कुटी है, प्रत्येक झरने में जल है, भिक्षा में अन्न सरलता से प्राप्य है; उन्हें ऐश्वर्यों से क्या प्रयोजन ! देव, हमारा एक देश नहीं है। समस्त भूमंडल में भ्रमण करते हैं। गुरु के उपदेश पर विश्वास करते हैं। संपूर्ण भुवनमंडल को हथेली पर धरे आँवले के समान देखते हैं। साँप के काटे, विष से छटपटाते, रोगी, शस्त्र द्वारा कटे सिर वाले, मौत से ठंडे पड़े को हे तात, हम क्षण भर में संपूर्ण रोगों से रहित कर देते हैं।
राजापि कुड्यन्तर्हित एव श्रुतसकलवृत्तान्तः सभामागतः कापा- लिकं दण्डवत्प्रणम्य, योगीन्द्र, रुद्रकल्प, परोपकारपरायण, महापा- पिना मया हतस्य पुत्रस्य प्राणदानेन मां रक्ष' इत्याह । अथ कापालिकोऽपि 'राजन्, मा भैषीः । पुत्रस्ते न मरिष्यति । शिवप्रसादेन गृहमेष्यति । परं श्मशानभूमौ बुद्धिसागरेण सह होमद्रव्याणि प्रेषय' इत्यवोचत् । ततो राजा 'कापालिकेन यदुक्तं तत्सर्वं तथा कुरु' इति बुद्धिसागरः प्रेषितः ।
ओट में खड़ा राजा भी समस्त वृत्तांत सुन कर सभा में आ गया और कापालिक को दंडवत् प्रणाम करके बोला- 'रुद्र के समान, परोपकार में लग्न योगिराज, मुझ महापापी द्वारा मार डाले गये पुत्र की रक्षा उसे प्राण देकर कीजिए।' कापालिक ने भी कहा- 'राजन्, मत डर । तेरा पुत्र नहीं मरेगा। शिव के प्रसाद से घर आयेगा। परंतु श्मशान भूमि में बुद्धिसागर के
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२२ भोजप्रबन्धः (२) गोविन्दपण्डितः भोजराजेन च विदुषां सम्मानः ततो मुञ्जे तपोवनं याते बुद्धिसागरं मुख्यामात्यं विधाय स्वराज्यं बुभुजे भोजराजभूपतिः। एवमतिक्रामति काले कदाचिद्राज्ञा क्रीडतो- द्यानं गच्छता कोऽपि धारानगरवासी विप्रो लक्षितः। स च राजानं वीक्ष्य नेत्रे निमील्यागच्छन्द्राज्ञा पृष्टः—'द्विज, त्वं मां दृष्ट्वा न स्वस्तीति जल्पसि। विशेषेण लोचने निमीलयसि। तत्र को हेतुः इति ! तत्पश्चात् मुंज के तपोवन चले जाने पर बुद्धिसागर को मुख्यमंत्री बनाकर राजा भोज अपने राज्य का भोग करने लगा। इस प्रकार समय व्यतीत होने पर क्रीडामग्न राजा ने उद्यान जाते हुए एक धारानगर निवासी ब्राह्मण देखा। राजा को देख आंख-मीच कर चले जाते उससे राजा ने पूछा—'हे ब्राह्मण, तुम मुझे देखकर 'स्वस्ति' (कल्याण हो) नहीं कहते हो और ऊपर से आँखें मूँद लेते हो। इसमें क्या कारण है ? विप्र आह—'देव, त्वं वैष्णवोऽसि। विप्राणां नोपद्रवं करिष्यसि ततस्त्वत्तो न मे भीतिः। किन्तु कस्मैचित्किमपि न प्रयच्छसि; तेन तव दाक्षिण्यमपि नास्ति। अतस्ते किमाशीर्वचसा। किं च प्रातरेव कृपण- मुखावलोकनात्परतोऽपि लाभहानिः स्यादिति लोकोक्त्या लोचने निमीलिते।' ब्राह्मण बोला—'देव, आप वैष्णव हैं; ब्राह्मणों का कोई अनिष्ट नहीं करेंगे, अतः आपसे डर नहीं है। किंतु किसी को कुछ देते नहीं, इससे आप में उदारता भी नहीं है। अतएव आशीर्वाद से आपका क्या ? परंतु सवेरे ही सवेरे कंजूस का मुँह देखने के कारण अन्य प्रकार से भी लाभ की हानि हो सकती है—इस कहावत को ध्यान में रखते हुए मैंने नेत्र मूँद लिये। अपि च—प्रसादो निष्फलो यस्य कोपश्चापि निरर्थकः। न तं राजानमिच्छन्ति प्रजाः षण्ढमिव स्त्रियः ॥ ४७ ॥ अप्रगल्भस्य या विद्या कृपणस्य च यद्धनम्। यच्च वाहुबलं भीरोर्व्यर्थमेतत्त्रयं भुवि ॥ ४८ ॥ कहा भी है—जिसकी प्रसन्नता निष्फल हो और क्रोध निरर्थक, ऐसे राजा को प्रजा नहीं चाहती, जैसे नपुंसक को स्त्रियां नहीं चाहतीं।
बोल न जानने वाले की जो विद्या है, कंजूस का जो धन है और डरपोक का जो भुजबल है,—ये तीनों संसार में व्यर्थ हैं। देव, मत्पिता वृद्धः काशीं प्रति गच्छन्मया शिक्षां पृष्टः—'तात, मया किं कर्त्तव्यम्' इति। पित्रा चेत्थमभ्यधायि— 'यदि तव हृदयं विद्वन्सुन्नयं स्वप्नेऽपि मा स्म सेविष्ठाः। सचिवजितं षण्ढजितं युवतिजितं चैव राजानम् ॥ ४६ ॥ पातकानां समस्तानां द्वे परे तात पातके। एक दुःसचिवो राजा द्वितीयं च तदाश्रयः ॥ ५० ॥ अ (१) विवेकमतिर्नृपतिर्मन्त्री गुणवत्सु वक्रितग्रीवः। यत्र खलाश्च प्रबलास्तत्र कथं सज्जनाकसरः ॥ ५१ ॥ राजा सम्पत्तिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणाश्रयः। भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ५२ ॥ महाराज, अपने काशी जाते बूढ़े पिता से मैंने सीख माँगी कि—'तात, मुझे क्या करना उचित है?' पिता ने इस प्रकार कहा:—'विद्वान् बेटे, यदि तेरे हृदय में सुनीति है तो स्वप्न में भी मंत्री के, नपुंसक के और तरुणी के वशीभूत राजा की सेवा न करना। हे तात, सब पापों में दो पाप सबसे बड़े हैं—एक बुरे मंत्रीवाला राजा और दूसरा उसका आश्रय। जहाँ विवेक बुद्धि शून्य राजा हो, जहाँ गुणियों पर टेढ़ी गरदन रखने- वाला (पराङ्मुख) मंत्री हो और खल दुष्ट प्रबल पड़ते हों, सज्जन को वहाँ अवसर कहाँ? संपत्तिहीन होने पर भी सेवनीय गुणों से मंडित राजा की सेवा करनी उचित है। कालांतर में उससे जीवन पर्यत फल मिलता है। अदातुर्दाक्षिण्यं नहि भवति। देव, पुरा कर्ण-दधिचि-शिवि- विक्रम-प्रमुखाः क्षितिप्तयो यथा परलोकमलङ्कुर्वाणा निजदानसमु- द्भूतदिव्यनवगुणैर्निवसन्ति महीमण्डले, तथा किमपरे राजानः। दान न करने वाले में उदारता नहीं होती। देव, प्राचीन काल में कर्ण, (१) अविवेका विवेकरहिता मतिः बुद्धिर्यस्य सः।
२४ भोजप्रबन्धः दधीचि, शिवि, विक्रम-आदि धरती के स्वामी अपने दान से उत्पन्न दिव्य नवीन गुणों से युक्त हो पृथ्वी मंडल पर परलोक को अलंकृत बनाते हुए जिस प्रकार रहते थे, वैसे और राजा क्या हैं ? देहे पातिनि का रक्षा यशो रक्ष्यमपातवत् । नरः पतितकायोऽपि यशःकायेन जीवति ॥ ५३ ॥ पण्डिते चैव मूर्खे च बलवत्यपि दुर्बले । ईश्वरे च दरिद्रे च मृत्योः सर्वत्र तुल्यता ॥ ५४ ॥ निमेषमात्रमपि ते वयो गच्छन्न तिष्ठति । तस्माद्देहेष्वनित्येषु कीर्तिमेकामुपार्जयेत् ॥ ५५ ॥ जीवितं तदपि जीवितमध्ये गण्यते सुकृतिभिः किमु पुंसाम् ! ज्ञानविक्रमकलाकुललज्जा-त्यागभोगरहितं विफलं यत्' ॥५६॥ नष्ट होने वाले देह की रक्षा क्या करना, अविनश्वर यश की रक्षा उचित है। देह नष्ट हो जाने पर भी मनुष्य यशः शरीर से जीवित रहता है। चाहे पंडित हो, चाहे मूर्ख; चाहे बली हो, चाहे दुर्बल; चाहे धनी हो, चाहे दरिद्र—मृत्यु सबको समान है। व्यतीत होती तेरी आयु पल भर को भी नहीं रुकती, इससे उचित है कि इन अनित्य शरीरों के रहते केवल यश का अर्जन करे । मनुष्यों का ज्ञान, पराक्रम, कला, कुल की लज्जा, त्याग और भोग से हीन जो निष्फल जीवन है, पुण्यकर्मा जन उसकी भी क्या जीवनों के मध्य गणना करते हैं ? राजापि तेन वाक्येन (१) पीयूपपूरस्नात इव, परब्रह्मणि लीन इव, लोचनाभ्यां हर्षाश्रूणि मुमोच । प्राह च द्विजम्—'विप्रवर, शृणु— सुलभाः पुरुषा लोके सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ ५७ ॥ मनीषिणः सन्ति न ते हितैषिणो हितैषिणः सन्ति न ते मनीषिणः । सुहृच्च विद्वानपि दुर्लभो नृणां यथौषधं स्वादु हितं च दुर्लभम्' ॥ ५८ ॥ इति विप्राय लक्षं दत्त्वा 'किं ते नाम' इत्याह ।
(१) सुधापूरस्नात इव ।
'भोजप्रबन्धः २५' राजा भी उस वाक्य से जैसे अमृत-प्रवाह में स्नान करता हुआ, जैसे परब्रह्म में लीन नेत्रों से हर्ष के आँसू गिराने लगा और ब्राह्मण से बोला— 'ब्राह्मण श्रेष्ठ, सुनो— निरंतर प्रिय बोलने वाले पुरुष संसार में सुलभ हैं; जो प्रिय न हो और हितकारी हो, ऐसे वचन कहने वाला और सुनने वाला दुर्लभ है । जो समझदार हैं, वे हित चाहने वाले नहीं हैं, जो हित चाहने वाले हैं, वे समझदार नहीं । जो मित्र भी हो, विद्वान् भी हो,—मनुष्यों में ऐसा व्यक्ति मिलता वैसे ही दुर्लभ है, जैसे स्वादिष्ट और लाभकारी औषध मिलना । ऐसा कह विप्र को एक लाख देकर पूछा कि—'तुम्हारा नाम क्या है ?' विप्रः स्वनाम भूमौ लिखति 'गोविन्दः' इति । राजा वाचयित्वा 'विप्र, प्रत्यहं राजभवनमागन्तव्यम् । न ते कश्चिन्निषेधः । विद्वांसः कवयश्च कौतुकात्सभामानोतव्याः । कोऽपि विद्वान्न खलु दुःखभागस्तु, एनमधिकारं पालय' इत्याह । ब्राह्मण ने अपना नाम धरती पर लिख दिया—'गोविंद' । वाँचकर राजा बोला—'ब्राह्मण, तुम्हें प्रतिदिन राजभवन में आना है। तुम्हारे लिए कोई रोक नहीं। और विद्वानों और कवियों को प्रसन्नतापूर्वक सभा में लाते रहना । कोई विद्वान् दुःखी न रहे । इस अधिकार का पालन करो ।' एवं गच्छत्सु कतिपयदिनेषु राजा विद्वत्प्रियो दानवित्तेश्वर इति प्रथामगात् । ततो राजानं दिदृक्षवः कवयो नानादिग्भ्यः समागताः। एवं वित्तादिव्ययं कुर्वाणं राजानं प्रति कदाचिन्मुख्यामात्येनेत्थमभ्य- धायि—'देव, राजानः कोशबला एव विजयिनः । नान्ये । स जयी वरमातङ्गा यस्य तस्यास्ति मेदिनी । कोशो यस्य स दुर्धर्षो दुर्गं यस्य स दुर्जयः ॥ ५६ ॥ देव लोकं पश्य— प्रायो धनवतामेव धने तृष्णा गरीयसी । पश्य कोटिद्वयासक्तं लङ्घाय प्रवणं धनुः ॥ ६० ॥ इति इस प्रकार कुछ दिवस व्यतीत होने पर राजा 'विद्वानों का प्यारा,' 'महान् दानशील' प्रसिद्ध हो गया । तब अनेक दिशाओं से राजा के दर्शनार्थी
२६ :भोजप्रबन्धः कवि आने लगे। इस प्रकार धन-आदि का व्यय करते हुए राजा से एक दिन मुख्यमंत्री ने इस प्रकार कहा—'महाराज, जिनपर कोश का बल होता है, वे ही राजा विजयी होते हैं, अन्य नहीं। जिसकी धरती अच्छी राज सेना से पूर्ण है, वह जयी होता है। जिसका कोश ठीक है, वह प्रचंड होता है; और जिस पर दुर्ग है, वह कठिनता से जीतने योग्य होता है। देव, दुनिया देखिए— प्रायशः धन के प्रति धनवानों की ही तृष्णा बड़ी होती है। दो कोटि— दोनों छोरों पर खींचा गया धनुष जैसे लक्ष के लिए उपयुक्त होता है, वैसे ही दो कोटि अर्थात् दो करोड़ का स्वामी मनुष्य लाख पाने के लिए यत्नशील रहता है।' राजा च तमाह— 'दानोपभोगवन्ध्या या सुहृद्भिर्या न भुज्यते। पुंसा समाहिता लक्ष्मीरलक्ष्मीः क्रमशौ भवेत् ॥ ६१ ॥ इत्युक्त्वा राजा तं मन्त्रिणं निजपदाद्दूरीकृत्य तत्पदेऽन्यं निवेश- यामास। आह च तम्-'लक्षं महाकवेर्देयं तदर्धं विबुधस्य च। देयं ग्रामैक मर्थ्यस्य तस्याप्यर्थं तदर्थिनः ॥ ६२ ॥ यश्च मेऽमात्यादिषु वितरणनिषेधमनाः स हन्तव्यः। उक्तं च— यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनां धनम्। अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥ ६३ ॥ प्रियः प्रजानां दातैव न पुनर्द्रविणेश्वरः। अयच्छन्काङ्क्षते लोकैर्वारिदो न तु वारिधिः ॥ ६४ ॥ सङ्ग्रहैकपरः प्रायः समुद्रोऽपि रसातले। दातारं जलदं पश्य गर्जन्तं भुवनोपरि' ॥ ६५ ॥ राजा ने उससे कहा— जो दान और उपभोग में नहीं आपाती अथवा मित्रों द्वारा जिसका भोग
भोजप्रबन्धः २७ नहीं हो पाता, मनुष्य की एकत्र की हुई वह लक्ष्मी धीरे-धीरे अलक्ष्मी हो जाती है। ऐसा कह कर राजा ने उसके पद से उस मंत्री को दूर करके उसके स्थान पर दूसरे को नियुक्त कर दिया और उस ( नये ) से कहा— ‘महाकवि को लाख दो, विद्वान् को उसका आधा; काव्यार्थ के ज्ञाता को एक गाँव देना और उसके सामान्यार्थ ज्ञाता को आधा गाँव । और मेरे मंत्रियों में जो दान का निषेध करने का इच्छुक है, वह वध योग्य है। कहा है— जिसका दान होता है और जिसका भोग होता है, धनियों का धन वही है। मरजाने वाले के अवशिष्ट स्त्रीसमूह और धन से दूसरे खेलते हैं। प्रजाजन का प्रिय दाता ही होता है, धनी नहीं। संसारी जनों द्वारा वारि दाता बादल की ही आकांक्षा की जाती है, वारि के कोष समुद्र की नहीं। संग्रह में ही लगा रहने वाला समुद्र प्रायः धरती पर ही रहता है और जल का दाता बादल—देखो, भुवन मंडल के ऊपर ही गरजता रहता है। एवं वितरणशालिनं भोजराजं श्रुत्वा कश्चित्कलिङ्गदेशात्कविरुपेत्य मासमात्रं तस्थौ। न च क्षोणीन्द्रदर्शनं भवति। आहारार्थे (१) पाथेय- मपि नास्ति। ततः कदाचिद्राजा मृगयाभिलाषी वहिर्निर्गतः। स कवि- र्दृष्ट्वा राजानमाह— ‘दृष्टे श्रीभोजराजेन्द्रे गलन्ति त्रीणि तत्क्षणात् । शत्रोः शस्त्रं कवेः कष्टं नीवीबन्धोऽमृगीदृशाम्’ ॥ ६६ ॥ राजा लक्षं ददौ। इस प्रकार दानशील भोजराज का श्रवण कर कलिंग देश से एक कवि आकर एक मास तक प्रतीक्षा करता रहा,। राजा का दर्शन न हो पाया। भोजन के लिए संवल भी न रहा। तब कभी राजा आखेट की इच्छा से बाहर निकला। देख कर वह कवि राजा से बोला— ‘श्री भोजराजेंद्र का दर्शन होते ही तीन वस्तुएँ उसी क्षण गल जाती हैं— (१) पथि साधु पाथेयम्, "पथ्यतिथिवसति०"-इत्यनेन ढञ् ।
२८ भोजप्रबन्धः शत्रु का शस्त्र, कवि को कष्ट और मृगनयनाओं का नीवीबंध। (एक पाठ 'नीवीवन्धो मृगीदृशां' के स्थान पर 'गर्विताञ्च गौरवम्' है, अर्थ-- 'अभिमानियों का मान' ।) राजा ने एक लाख मुद्रा दिया। ततस्तस्मिन्मृगयारसिके राजनि कश्चन पुलिन्दपुत्रो गायति। तद्गीतमाधुर्य्येण तुष्टो राजा तस्मै पुलिन्दपुत्राय पञ्चलक्षं ददौ। तदा कविस्तद्दानमत्युन्नतं किरातपोतं च दृष्ट्वा नरेन्द्रपाणिकमलस्थपङ्कज- मिषेण राजानं वदति— एते हि गुणाः पङ्कज सन्तोऽपि न ते प्रकाशमायान्ति । यल्लक्ष्मीवसतेस्तव मधुपैरुपभुज्यते कोशः ॥ ६७ ॥ भोजस्तमभिप्रायं ज्ञात्वा पुनर्लक्षमेकं ददौ । तदनंतर राजा के मृगया में अनुरक्त रहने पर किसी भील के बेटे ने गाया। उस गीत माधुरी से संतुष्ट हो राजा ने भील के पुत्र को पाँच लाख दिये। तब कवि ने उस किरात पुत्र के अनुपात में दान को कहीं अधिक देखकर राजा के करकमल में स्थित कमल के व्याज से राजा से कहा- हे कमल, रहने पर भी तेरे वे गुण प्रकट नहीं हो पाते क्योंकि लक्ष्मी के निवास स्थल तेरे कोश का उपभोग भ्रमर कर लेते है। भोज ने उसका अभिप्राय समझ कर फिर एक लाख दिया। ततो राजा ब्राह्मणमाह— 'प्रभुभिः पूज्यते विप्र कलैव न कुलीनता । कलावान्मान्यते मूर्ध्नि सत्सु देवेषु शम्भुना' ॥ ६८ ॥ एवं वदति भोजे कुतोऽपि (१) पञ्चषाः कवयः समागताः । तान्दृष्ट्वा राजा विलक्षण इवासीत्—'अद्यैव मयैतावद्वित्तं दत्तम्' इति । ततः कविस्तमभिप्रायं ज्ञात्वा नृपं पद्ममिषेण पुनः प्राह.... 'किं कुप्यसि कस्मैचन सौरभसाराय कृप्य निजमधुने ! यस्य कृते शतपत्र प्रतिपत्रं तेऽद्य मृग्यते भ्रमरैः' ॥ ६६ ॥ तब राजा ने ब्राह्मण से कहा- (१) पंच वा षड् वा पञ्चषाः “संख्ययाव्ययासन्ना०” इत्यनेन बहुव्रीहिः।
भोजप्रबन्धः २६ हे ब्राह्मण, समर्थ पुरुषों द्वारा कुलीनता की नहीं, कला की ही पूजा की जाती है। इतने देवों के होने पर भी कलावान् चंद्रमा ही शिव शंभु द्वारा सम्मानित होता है। भोजराज के ऐसा कहते ही कहीं से पाँच-छः कवि आ गये। उन्हें देखकर राजा विगतलक्षण—अनमना-सा हो गया कि आज ही मैंने इतना धन दान किया है। तब कवि ने उसके अभिप्राय को समझ कर पुनः कमल के व्याज से राजा से कहा— हे शतदल कमल, जिसके निमित्त भ्रमर आज तेरे पत्ते-पत्ते में अनुसंधान कर रहे हैं, उस नवीन सुगंध के सार से पूर्ण अपने मधु के हेतु क्यों किसी से कुपित होते हो ? ततः प्रभुं प्रसन्नवदनमवलोक्य प्रकाशेन प्राह— 'न दातुं नोपभोक्तुं च शक्नोति कृपणः श्रियम् । किन्तु स्पृशति हस्तेन नपुंसक इव स्त्रियम् ॥ ७० ॥ याचितो यः प्रहृष्येत दत्त्वा प्रीतिमान्भवेत् । तं दृष्ट्वाप्यथवा श्रुत्वा नरः स्वर्गमवाप्नुयात्' ॥ ७१ ॥ ततस्तुष्टो राजा पुनरपि कलिङ्गदेशवासिकवये लक्षं ददौ। तत्पश्चात् स्वामी को प्रसन्नवदन देखकर प्रकट रूप से बोला— कंजूस न तो संपत्ति का दान कर पाता है, न भोग । नपुंसक जैसे स्त्री को हाथ से छूता भर है, वैसे ही वह भी संपत्ति का हाथ से स्पर्श मात्र करता है। जो याचना किये जाने पर हर्ष को प्राप्त हो और देकर प्रसन्न हो, ऐसे व्यक्ति को देखकर अथवा उसके विषय में सुनकर भी मनुष्य को स्वर्ग प्राप्त होता है। तब संतुष्ट हो राजा ने कलिंग देश के वासी कवि को पुनः लाख दिये। ततः पूर्वकविः पुरःस्थितान्षट्कवीन्द्रान्दृष्ट्वाह—'हे कवयः, अत्र महासरः सेतुभूमौवासी राजा यदा भवनं गमिष्यति तदा किमपि ब्रूत' इति। ते च सर्वे महाकवयोऽपि सर्वं राज्ञः प्रथमचेष्टितं ज्ञात्वावर्तन्त। तेष्वेकः सरोमिषेण नृपं प्राह—
३० भोजप्रबन्धः 'आगतानामपूर्णानां पूर्णानामपि गच्छताम् ! यद्ध्वनि न सङ्घट्टो घटानां तत्सरो वरम्' ॥ ७२ ॥ इति । तस्य राजा लक्षं ददौ । तब पहिले आया कवि संमुख स्थित छः कविराजों को देखकर बोला -- हे कवियों, इस महान् सरोवर की तटभूमि पर स्थित राजा जब स्व-भवन जाय, तब कुछ कहना । वे सब महाकवि राजा का संपूर्ण पूर्व कृत आचरण जान कर खड़े थे । उनमें से एक सरोवर के व्याज से राजा से बोला-- खाली आये और भर कर जाते घड़ों की मार्ग में जो टकराहट न हो, तालाब वही अच्छा होता है । संतुष्ट राजा ने उसे लाख दिये । ततो गोविन्दपण्डितस्तान्कवीन्द्रान्दृष्ट्वा चुकोप। तस्य कोपाभिप्रायं ज्ञात्वा द्वितीयः कविराह-- 'कस्य तृषं न क्षपयसि पिबति न कस्तव पयः प्रविश्यान्तः । यदि सन्मार्गसरोवर नक्रो न क्रोडमधिवसति' ॥ ७३ ॥ राजा तस्मै लक्षद्वयं ददौ । तं च गोविन्दपण्डितं व्यापारपदाद्दूरीकृत्य , 'त्वयापि सभायामागन्तव्यम्, परं तु केनापि दौष्ट्यं न कर्तव्यम्' इत्यु- क्त्वा ततस्तेभ्यः प्रत्येकं लक्षं दत्त्वा स्वनगरमागतः ते च यथायथं गताः । तब गोविंद पंडित उन कविराजों को देखकर क्रुद्ध हो गया । उसके क्रोध का अभिप्राय जानकर दूसरा कवि बोला -- हे मार्ग के सुन्दर सरोवर, तुम किस की प्यास न बुझा देते और कौन तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होकर जल नहीं पी लेता, यदि तुम्हारे भीतर मगर न निवास करता ? राजा ने उसे दो लाख दिये । और उस गोविंद पंडित को प्रदत्त कार्य के पद से हटाकर आज्ञा दी--'सभा में तुम भी आना, परंतु किसी के साथ दुष्टता न करना ।' और ऐसा कह कर राजा उन सब में प्रत्येक को लाख- लाख देकर अपने नगर लौट आया । वे सब कवि अपने-अपने स्थान को गये । ततः कदाचिद्राजा मुख्यामात्यं प्राह-
भोजप्रबन्धः ३१ 'विप्रोऽपि यो भवेन्मूर्खः स पुराद्बहिरस्तु मे । कुम्भकारोऽपि यो विद्वान्स तिष्ठतु पुरे मम' ॥ ७४ ॥ इति । अतः कोऽपि न मूर्खोऽभूद्धारानगरे । तदनंतर एकवार राजा ने मुख्य मंत्री से कहा-- ब्राह्मण भी यदि मूर्ख हो, तो मेरी पुरी के बाहर रहे और कुम्हार भी यदि विद्वान् हो तो मेरे नगर में निवास करे । अतः धारा नगर में कोई मूर्ख नहीं रहा । ३—राजसभायां कालिदासस्य आगमनम् ततः क्रमेण पञ्चशतानि विदुषां वररुचि-बाण-मयूर-रेफण-हरि- शंकर-कलिङ्ग-कर्पूर-विनायक-मदन-विद्या-विनोद्-कोकिल-तारेन्द्रमुखाः सर्वशास्त्रविचक्षणाः सर्वे सर्वज्ञाः श्रीभोजराजसभामलंचक्रुः । एवं स्थिते कदाचिद्विद्वद्वृन्दवन्दित-सिंहासनासीने कविशिरोमणौ कवित्वप्रिये विप्रप्रियबान्धवे भोजेश्वरे द्वारपाल एत्य प्रणम्य व्यजिज्ञपत्—'देव, कोऽपि विद्वान्द्वारि तिष्ठति' इति । तत्पश्चात् धीरे-धीरे समस्त शास्त्रों के विज्ञाता, सब सबकुछ जानने वाले वररुचि, वाण, मयूर, रेफण, हरि, शंकर, कलिंग, कर्पूर, विनायक मदन, विद्याविनोद, कोकिल, तारेंद्र आदि पाँच सौ विद्वान् श्री भोजराज की सभा को सुशोभित करने लगे । इस प्रकार कभी विद्वत्समूह द्वारा वंदित सिंहासन पर कवि शिरोमणि, कवित्व को प्रेम करनेवाले, ब्राह्मणों के प्यारे बंधु राजा भोज के बैठे होने पर द्वारपाल ने आकर तथा प्रणाम करके निवेदन किया- 'महाराज, द्वार पर कोई विद्वान् प्रतीक्षा कर रहा है।' अथ राजा 'प्रवेशय तम्' इत्याज्ञप्ते सोऽपि दक्षिणेन पाणिना समुन्नतेन विराजमानो विप्रः प्राह-'राजन्नभ्युदयोऽस्तु' राजा—'शंकरकवे किं पत्रिकायामिदम्' कविः—'पद्यम्' राजा—'कस्य' कविः—'तवैव भोजनृपते' राजा—'तत्पठ्यताम्'
३२ भोजप्रबन्धः कविः- 'पठ्यते' । एतासामरविन्दसुन्दरदृशां द्राक्चामरान्दोलना- दुल्ललद्गुजवल्लिकङ्कणझणत्कारः क्षणं वार्यताम् ॥ ७५ ॥ यथा यथा भोजयशो विवर्धते सितां त्रिलोकीमिव कर्तुमुद्यतम् । तथा तथा मे हृदयं विदूयते प्रियालकालीधवलत्वशङ्कया' ॥ ७६ ॥ ततो राजा शंकरकवये द्वादशलक्षं ददौ। सर्वे विद्वांसश्च विच्छाय- वदना बभूवुः। परं कोऽपि राजभयान्नावदत्। राजा च कार्यवशाद्- गृहं गतः । राजा द्वारा उसे प्रविष्ट कराने का आदेश होने पर दाहिना हाथ ऊपर उठाये वह ब्राह्मण बोला- राजन्, उन्नति हो। राजा ने पूछा- हे शंकर कवि, पत्रिका में क्या है ? कवि- पद्य । राजा- किसके निमित्त ? कवि- हे भोजराज, आपके ही निमित्त । राजा- तो पढ़िए । कवि- पढ़ता हूँ- परंतु क्षण भरको इन कमल के समान सुंदर नयनों वाली रमणियों के जल्दी-जल्दी चँवर डुलाने के कारण हिलती भुजलताओं में पड़े कंकणों के झणत्कार का निवारण तो कीजिए । हे भोज, तीनों लोकों को सफेद करने को उद्यत आपका यश जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे अपनी प्रिया की अलकावली के श्वेत हो जाने की आशंका से मेरा हृदय व्यथित होता है । तब राजा ने शंकर कवि को बारह लाख दिये । और सब विद्वानों के मुख उतर गये, परंतु राजा के डर से सब चुप रहे । राजा कार्यवश बाहर चला गया । ततो विभूपालां सभां दृष्ट्वा विबुधगणस्तं निनिन्द- 'अहो नृपतेरज्ञता । किमस्य सेवया । वेदशास्त्रविचक्षणेभ्यः स्वाश्रयकविभ्यो लक्षमदात् । किमनेन वितुष्टेनापि । असौ च केवलं ग्राम्यः कविः शंकरः । किमस्य प्रागल्भ्यम् ।' इत्येवं कोलाहलरवे जाते कश्चिदभ्यगात्
कनकमणिकुण्डलशाली दिव्यांशुकप्रावरणो नृपकुमार इव मृगमदपङ्क- कलङ्कितगात्रो नवकुसुमसमभ्यर्चितशिराश्चन्दनाङ्गरागेण विलोभयन्वि- लास इव मूर्तिमान्कवितेव तनुमाश्रितः शृङ्गाररसस्य स्यन्द इव सस्पन्दो महेन्द्र इव महीवलयं प्राप्तो विद्वान्। तं दृष्ट्वा सा विद्वत्परिषद्भयकौतुकयोः पात्रमासीत् । स च सर्वान्प्रणिपत्य प्राह—'कुत्र भोजन्नृपः' इति । ते तमूचुः-इदानीमेव सौधान्तरगतः' इति । ततोऽसौ प्रत्येकं तेभ्यस्ताम्बूलं दत्त्वा गजेन्द्रकुलगतो मृगेन्द्र इवासीत् । तदनंतर सभा को राजा से रहित पाकर विद्वान् लोग उसकी निंदा करने लगे—'अरे, राजा का अज्ञान है । इसकी सेवा से क्या लाभ ? वेद-शास्त्रों के विज्ञाता अपने आश्रित कवियों को इसने एक लाख दिया । इतने असंतुष्ट होने से भी क्या ? यह एक ग्रामीण कवि मात्र है। इसमें प्रगल्भता ही क्या है ?' इस प्रकार कोलाहल शब्द होने पर सोने के मणिजटित कुंडल-धारण किये, अत्यंत सुंदर वस्त्र पहिने, राजकुमार की भाँति कस्तूरी का लेप समस्त शरीर पर किये, नवीन पुष्पों से सिर को सुशोभित किये, चंदन के अंगराग से लुब्ध करता हुआ मूर्तिमान् विलास के समान, जैसे कविता ने ही देह-धारण की हो ऐसा, श्रृंगार रस के प्रवाह की भाँति, भूतल पर अवतीर्ण साक्षात् महेंद्र के समान कोई विद्वान् आया । उसे देखकर वह विद्वन्मंडली भय और कौतुक की पात्र बन गयी । वह सबको प्रणाम करके बोला—'राजा भोज कहाँ हैं ?' उन्होंने उसे बताया—'अभी प्रासाद में गये हैं ।' तब वह उन सबको एक-एक तांबूल देकर गजराजों के बीच स्थित मृगराज की भाँति स्थित हुआ । ततः स महापुरुषः शंकरकविप्रदानेन कुपितांस्तान्बुद्ध्वा प्राह— 'भवद्भिः शंकरकवये द्वादशलक्षाणि प्रदत्तानीति न मन्तव्यम् । अभि- प्रायस्तु राज्ञो नैव बुद्धः । यतः शंकरपूजने प्रारब्धे शंकरकविस्त्वेकैनैव लक्षेण पूजितः । किं तु तन्निष्ठांस्तन्नाम्ना विभ्राजितानेकादशरुद्राञ्शंक- रानपरान्मूर्तीन्प्रत्यक्षाञ्ज्ञात्वा तेषां प्रत्येकमेकैकं लक्षं तस्मै शङ्करकवय एव शङ्करमूर्तये प्रदत्तमिति राज्ञोऽभिप्रायः' इति । सर्वेऽपि चमत्कृ- तास्तेन । ३ भोज०
३४ भोजप्रबन्धः तत्पश्चात् शंकर कवि को दान मिलने के कारण उन (विद्वानों) को क्रुद्ध हुआ जान वह महापुरुष बोला- 'शंकर कवि को बारह लाख दिये गये हैं'—आपका यह मानना उचित नहीं है । राजा का अभिप्राय तो आपने नहीं समझा । वस्तुतः शंकर-पूजन आरब्ध होने पर शंकर कवि तो एक लाख से ही पूजा गया है, किंतु उसमें स्थित और उसके नाम से प्रकाशित एकादश रुद्रों को, शंकर की अन्य प्रत्यक्ष मूर्तियाँ समझ कर, उनमें से प्रत्येक को एक एक लाख शंकर कवि को ही शंकरमूर्ति विचार कर दिया गया-राजा का यह अभिप्राय है।' उसने सब को चमत्कृत कर दिया । ततः कोऽपि राजपुरुषस्तद्विद्वत्स्वरूपं द्राग्राज्ञे निवेदयामास । राजा च स्वमभिप्रायं साक्षाद्विदितवन्तं तं महेशमिव महापुरुषं मन्यमानः स- भामभ्यगात् । स च 'स्वस्ति'- इत्याह राजानम् । राजा च तमालिङ्ग्य प्रणम्य निजकरकमलेन तत्करकमलमवलम्ब्य सौधान्तरं गत्वा प्रोत्तुङ्ग- गवाक्ष उपविष्टः प्राह - 'विप्र भवन्नाम्ना कान्यक्षराणि सौभाग्यावल- म्बितानि । कस्य वा देशस्य भवद्विरहः सुजनान्बाधते' इति । ततः कविर्लिखति राज्ञो हस्ते 'कालिदासः' इति । राजा वाचयित्वा पादयोः पतति । तदनंतर किसी राजपुरुष ने शीघ्रता पूर्वक उस विद्वान के स्वरूप के विषय में राजा के आगे निवेदन किया । अपने अभिप्राय को ठीक-ठीक समझ- लेने वाले उसे प्रत्यक्ष महादेव मान कर राजा सभा में गये। उसने राजा से कहा- कल्याण हो।' राजा ने उसका आलिंगन किया और प्रणाम किया और अपने करकमल से उसके करकमल को पकड़ कर प्रासाद के भीतर जा खूब ऊंचे झरोखे में बैठकर बोला-ब्राह्मण, आपके नाम ने किन अक्षरों को सौभाग्य- शाली बनाया है और किस देश के सत्पुरुषों को आपका विरह व्यथित कर रहा है?' तब कवि ने राजा के हाथ पर लिख दिया- 'कालिदास' । बांच कर राजा पैरों पड़ गया । ततस्तत्रासीनयोः कालिदासभोजराजयोरासीत्सन्ध्या । राजा-सखे, सन्ध्यां वर्णय' इत्यवादीत् । कालिदासः—
भोजप्रबन्धः ३५ 'व्यसनिन इव विद्या च्छीयतेपङ्कजश्री- गुणिन इव विदेशे दैन्यमायान्ति भृङ्गाः । कुन्नृपतिरिव लोकं पीडयत्यन्धकारो धनमिव कृपणस्य व्यर्थतामेति चक्षुः' ॥ ७७ ॥ तत्पश्चात् कालिदास और भोजराज के वहाँ बैठे-बैठे सांझ हो गयी । राजा ने कहा—'मित्र, संध्या का वर्णन करो ।' कालिदासने वर्णन किया--- कमल की शोभा व्यसनों में लीन मनुष्य की विद्या के समान क्षीण हो रही है, जैसे परदेस में गुणी दीनता को प्राप्त हो जाते हैं, वैसे ही भौंरे दीनता को प्राप्त हो रहे हैं। बुरे राजा की भांति अंधकार संसार को पीड़ा दे रहा है और कंजूस के धन के तुल्य नेत्र व्यर्थ हो रहे हैं । पुनश्च राजानं स्तौति कविः - 'उपचारः कर्तव्यो यावदनुत्पन्नसौहृदाः पुरुषाः । उत्पन्नसौहृदानामौपचारः कैतवं भवति ॥ ७८ ॥ दत्ता तेन कविभ्यः पृथ्वी सकलापि कनकसम्पूर्णा । दिव्यां सुकाव्यरचनां क्रमं कवीनां च यो विजानाति ॥७६॥ सुकवेः शब्द सौभाग्यं सत्कविर्वेत्ति नापरः । बन्ध्या न हि विजानाति परां दौर्हृदसम्पदम्' ॥ ८० ॥ इति । ततः क्रमेण भोजकालिदासयोः प्रीतिरजायत । फिर कवि ने राजा की स्तुति की-- जब तक पुरुषों में मित्रता उत्पन्न न हो, उपचार ( वाह्य आचार ) तभी तक करना उचित हैं । जिनमें मैत्री हो गयी है, उनमें दिखावा वरतना वंचना है । उसने सोने से भरी पूरी समूची धरती ही कवियों को दे डाली, जो अलौकिक सुकाव्य की रचना और उसके पूर्वा पर संबंध को समझता है । सुकवि के शब्द-सौभाग्य को सुकवि ही जानता है, अन्य नहीं; दूसरे की गर्भ-संपदा (संतान को पेट में रखने का सौभाग्य ) को वांझ नहीं जानती ।
३६ भोजप्रबन्धः तदनंतर धीरे-धीरे भोज और कालिदास में प्रीति हो गयी । ४—कालिदासेन भोजः प्रशंसितः ततः कालिदासं वेश्यालम्पटं ज्ञात्वा तस्मिन्सर्वे द्वेषं चक्रुः । न को- ऽपि तं स्पृशति । अथ कदाचित्सभामध्ये कालिदासमालोक्य भोजेन मनसा चिन्तितम्—‘कथमस्य प्राज्ञस्यापि स्मरपीडाप्रमादः’ इति । सोऽपि तदभिप्रायं ज्ञात्वा प्राह— ‘चेतोभुवश्चापलताप्रसङ्गे का वा कथा मानुषलोकभाजाम् । यद्दाहशीलस्य पुरां विजेतुस्तथाविधं पौरुषमर्धमासीत्’ ॥ ८१ ॥ ततस्तुष्टो भोजराजः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तत्पश्चात् कालिदास को वेश्यागामी जानकर सब उससे द्वेष करने लगे । उसका स्पर्श भी कोई न करता था । कभी सभा के मध्य कालिदास को देखकर भोज मन ही मन विचारने लगा—‘ऐसे प्रकृष्ट विद्वान् को भी कामपीडा क्यों है ?’ कालिदास ने उसका अभिप्राय समझ कर कहा— मनसिज काम की चंचलता के आगे मनुष्यलोक के निवासियों की तो कथा ही क्या है, जब कि कामदहन करने वाले त्रिपुरजयी शिव का ही वह विख्यात पौरुष [काम के संदर्भ में ] आधा रह गया था । संतुष्ट होकर राजा भोज ने प्रत्येक अक्षर पर लाख-लाख दिया । ततः कालिदासो भोजं स्तौति— ‘महाराज श्रीमज्जगति यशसा ते धवलिते पयः पारावारं परमपुरुषोऽयं मृगयते । कपर्दी कैलासं करिवरमभौमं कुलिशभृ- `त्कलानार्थं राहुः कमलभवनो हंसमधुना ॥ ८२ । तदनंतर कालिदास ने भोज की स्तुति की— हे श्रीमन् महाराज, तुम्हारे यश से समग्र संसार के शुभ्र हो जाने पर संप्रति ये पुरुषोत्तम विष्णु क्षीर समुद्र का अन्वेषण करते हैं, जटाजूटधारी शिव कैलास का, वज्रधर इंद्र दिव्य गजवर ऐरावत का, राहु चंद्रमा का और कमलवासी ब्रह्मा अपने वाहन हंस का ।
भोजप्रबन्धः ३७ नीरक्षीरे गृहीत्वा निखिलखगततीर्याति नालीकजन्मा तक्रं धृत्वा तु सर्वानटति जलनिधींश्चक्रपाणिर्मुकुन्दः । सर्वानुत्तुङ्गशैलान्दहति पशुपतिः कालनेत्रेण पश्यन् व्याप्तात्वत्कीर्तिकान्ता त्रिजगति नृपते भोजराज क्षितीन्द्र॥८३॥ हे पृथिवीपति, नरेश भोजराज, तीनों लोकों में तुम्हारी कमनीय कीर्तिरुपी कांता व्याप्त हो गयी है ( परिणाम स्वरूप त्रिलोकी शुभ्र होगया है ) । सो नालीक—कमल से जन्म लेने वाले ब्रह्मा नीर-क्षीर लिये समस्त पक्षियों के पास जा रहे हैं [ जिससे वे नीर क्षीर विवेकी हंस को पहिचान सकें ]; चक्रपाणि विष्णु [ चक्र छोड़ ] तक्र [ माठा ] हाथ में लिये संपूर्ण समुद्रों में घूम रहे हैं [ जिससे माठा छोड़कर वे दूध फाड़ सकें और इस प्रकार सब समुद्रों के मध्य उन सबके श्वेत हो जाने से छिप गया उनका क्षीर समुद्र मिल सके ] । पशुपति शिव अपने ज्वालामय तृतीय नेत्र से देखते हुए सब ऊँचे पर्वतों को तपा रहे हैं [ कि हिम पिघलने से पिघलते हुए अपने कैलास को वे पहिचान सकें ] । विद्वद्राजशिखामणे तुलयितुं धाता त्वदीयं यशः कैलासं च निरीक्ष्य तत्र लघुतां निश्चित्वापूर्तये । उ(१)क्षाणं तदुपर्युमासहचरं तन्मूर्ध्नि गङ्गाजलं तस्याग्रे फणिपुङ्गवं तदुपरि स्फारं सुधादीधितिम् ॥ ८४ ॥ विद्वानों और राजाओं की चोटी में स्थित मणि स्वरूप [ श्रेष्ठ ] राजन्, विधाता ने तुम्हारे यश की तौल करने के निमित्त कैलास को निरखा, पर उसमें हल्कापन पाकर पूरा करने के लिए उसके ऊपर नंदी को रखा, नंदी पर उमासहित महेश को बैठाया, महेश के सिर पर जलमयी गङ्गा की स्थापना की, चोटी पर नागराज को स्थित किया और अंत में सबके ऊपर कांतिमान् अमृत किरण चंद्रमा को रख दिया । स्वर्गाद्गोपाल कुत्र व्रजसि सुरमुने भूतले कामधेनो- र्वत्सस्यानेतुकामस्तृणचयमधुना मुग्ध दुग्धं न तस्याः । श्रुत्वा श्रीभोजराजप्रचुरवितरणं व्रीडशुष्कस्तनी सा ( १ ) उक्षाणम्--वृषभम् ।
भोजप्रबन्धः ३६ पढ़ा—'घी-पड़ी दाल के साथ।' [ एक श्लोक के दो चरण-पूर्वार्द्ध तो हुआ, पर ] उत्तरार्द्ध की स्फुरणा नहीं हुई । ततो देवतासदनं कालिदासः प्रणामार्थमगात् । तं वीक्ष्य द्विजा ऊचुः—'अस्माकं समग्रवेदविदामपि भोजः किमपि नार्पयति । भवादृशां हि यथेष्टं दत्ते । ततोऽस्माभिः कवित्वविधानधियात्रागतम् । चिरं विचा- र्य्य पूर्वार्धमभ्यधायि, उत्तरार्धं कृत्वा देहि । ततोऽस्मभ्यं किमपि प्रयच्छ- ति।' इत्युक्त्वा तत्पुरस्तादर्धमभाणि । स च तच्छ्रुत्वा । 'माहिषं च शरच्चन्द्रचन्द्रिकाधवलं दधि' ॥ ८६ ॥ इत्याह । इसी बीच देवमंदिर में प्रणाम करने के लिए कालिदास आ पहुँचे । उन्हें देखकर वे ब्राह्मण बोले—'हम संपूर्ण वेदों के ज्ञाताओं को भी भोज कुछ नहीं देता, आप जैसों को यथेच्छ देता है । सो कविता बनाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं । बहुत देर तक सोच-विचार कर [ श्लोक का ] पूर्वार्द्ध तो बना लिया है, उत्तरार्द्ध तुम बना दो । तो राजा हमको भी कुछ देगा ।' यह कह कर कालिदास के संमुख आधा [ स्वनिर्मित श्लोक ] पढ़ दिया । कालिदास ने वह सुनकर उत्तरार्द्ध कह सुनाया— 'शरत् काल के चंद्र की चाँदनी के समान शुभ्र भैंस का दही भी ।' ते च राजभवनं गत्वा दौवारिकानूचुः—'वयं कवितां कृत्वा समा- गताः । राजानं दर्शयत' इति । ते च कौतुकाद्धसन्तो गत्वा राजानं प्रण- म्य प्राहुः— 'राजमाषनिभैर्दन्तैः कटिविन्यस्तपाणयः । द्वारि तिष्ठन्ति राजेन्द्र च्छान्दसाः श्लोकशत्रवः' ॥ ८७ ॥ इति वे [ ब्राह्मण ] राज भवन में पहुँच कर द्वारपालों से बोले—'हम कविता करके आये हैं । राजा का दर्शन कराओ ।' द्वारपाल कौतुक से हँसते हुए राजा को प्रणाम करके बोले— हे राजेंद्र, राजमाँ [ बड़ा काला उड़द ] के समान दाँतों वाले, कमर पर [ अभद्रता से ] हाथ रखे, श्लोकों के शत्रु तुक्कड़ वेद पाठी द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं ।
४० भोजप्रबन्धः राज्ञा प्रवेशितास्ते दृष्टराजसंसदो मिलिताः सन्तः सहैव कवित्वं पठन्ति स्म। राजा तच्छ्रुत्वोत्तरार्धं कालिदासेन कृतमिति ज्ञात्वा विप्रानाह—'येन पूर्वार्धं कारितं तन्मुखात्कवित्वं कदाचिदपि न करणी- यम्। उत्तरार्धस्य किञ्चिद्दीयते, न पूर्वार्धस्य।' इत्युक्त्वा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। राजा के द्वारा सभा में बुला लिये गये वे पंडित राजसभा को देखकर एक साथ ही कविता पढ़ने लगे। राजा ने सुनकर जान लिया कि उत्तरार्द्ध कालि- दास कृत है और ब्राह्मणों से कहा—'जिसने श्लोक का पूर्वार्द्ध बनाया है, उसके मुख से फिर कभी कविता न की जानी चाहिए। उत्तरार्द्ध के लिए कुछ दिया जाता है, पूर्वार्द्ध के लिए नहीं।' ऐसा कह कर प्रत्यक्षर लाख- लाख दिया। तेषु च दक्षिणामादाय गतेषु कालिदासं वीक्ष्य राजा प्राह--'कवे उत्तरार्धं त्वया कृतम्' इति। कविराह— 'अधरस्य मधुरिमाणं कुचकाठिन्यं दृशोश्च तैक्ष्ण्यं च। कवितायां परिपाकं ह्यनुभवरसिको विजानाति' ॥ ८८ ॥ दक्षिणा लेकर उनके चले जाने पर कालिदास को देखकर राजा ने कहा—'कवि, उत्तरार्द्ध तुमने किया था ?' कवि ने कहा— अधर की माधुरी, कुच की कठोरता, नेत्रों का तीखापन और काव्य की परिपक्वता अनुभवी, रसिक व्यक्ति ही समझता है। राजा च—'सुकवे, सत्यं वदसि। अपूर्वो भाति भारत्याः काव्यामृतफले रसः। चवणे सर्वसामान्ये स्वादुवित्केवलः कविः ॥ ८६ ॥ सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य जगत्समस्तं त्रयः पदार्था हृदयं प्रविष्टाः। इक्षोर्विकारा मतयः कवीनां मुग्धाङ्गनापाङ्गतरङ्गितानि' ॥६०॥ राजा ने कहा--हे सुकवि, सत्य कहते हो-- भारती [वाणी] के 'काव्यरूपी अमृत फल का रस अपूर्व ही होता है; उसे चबाकर खा तो सभी सकते हैं, पर उसका स्वादवेत्ता कवि ही होता है।