भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ३७ नीरक्षीरे गृहीत्वा निखिलखगततीर्याति नालीकजन्मा तक्रं धृत्वा तु सर्वानटति जलनिधींश्चक्रपाणिर्मुकुन्दः । सर्वानुत्तुङ्गशैलान्दहति पशुपतिः कालनेत्रेण पश्यन् व्याप्तात्वत्कीर्तिकान्ता त्रिजगति नृपते भोजराज क्षितीन्द्र॥८३॥ हे पृथिवीपति, नरेश भोजराज, तीनों लोकों में तुम्हारी कमनीय कीर्तिरुपी कांता व्याप्त हो गयी है ( परिणाम स्वरूप त्रिलोकी शुभ्र होगया है ) । सो नालीक—कमल से जन्म लेने वाले ब्रह्मा नीर-क्षीर लिये समस्त पक्षियों के पास जा रहे हैं [ जिससे वे नीर क्षीर विवेकी हंस को पहिचान सकें ]; चक्रपाणि विष्णु [ चक्र छोड़ ] तक्र [ माठा ] हाथ में लिये संपूर्ण समुद्रों में घूम रहे हैं [ जिससे माठा छोड़कर वे दूध फाड़ सकें और इस प्रकार सब समुद्रों के मध्य उन सबके श्वेत हो जाने से छिप गया उनका क्षीर समुद्र मिल सके ] । पशुपति शिव अपने ज्वालामय तृतीय नेत्र से देखते हुए सब ऊँचे पर्वतों को तपा रहे हैं [ कि हिम पिघलने से पिघलते हुए अपने कैलास को वे पहिचान सकें ] । विद्वद्राजशिखामणे तुलयितुं धाता त्वदीयं यशः कैलासं च निरीक्ष्य तत्र लघुतां निश्चित्वापूर्तये । उ(१)क्षाणं तदुपर्युमासहचरं तन्मूर्ध्नि गङ्गाजलं तस्याग्रे फणिपुङ्गवं तदुपरि स्फारं सुधादीधितिम् ॥ ८४ ॥ विद्वानों और राजाओं की चोटी में स्थित मणि स्वरूप [ श्रेष्ठ ] राजन्, विधाता ने तुम्हारे यश की तौल करने के निमित्त कैलास को निरखा, पर उसमें हल्कापन पाकर पूरा करने के लिए उसके ऊपर नंदी को रखा, नंदी पर उमासहित महेश को बैठाया, महेश के सिर पर जलमयी गङ्गा की स्थापना की, चोटी पर नागराज को स्थित किया और अंत में सबके ऊपर कांतिमान् अमृत किरण चंद्रमा को रख दिया । स्वर्गाद्गोपाल कुत्र व्रजसि सुरमुने भूतले कामधेनो- र्वत्सस्यानेतुकामस्तृणचयमधुना मुग्ध दुग्धं न तस्याः । श्रुत्वा श्रीभोजराजप्रचुरवितरणं व्रीडशुष्कस्तनी सा ( १ ) उक्षाणम्--वृषभम् ।