भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

भोजप्रबन्धः ३६ पढ़ा—'घी-पड़ी दाल के साथ।' [ एक श्लोक के दो चरण-पूर्वार्द्ध तो हुआ, पर ] उत्तरार्द्ध की स्फुरणा नहीं हुई । ततो देवतासदनं कालिदासः प्रणामार्थमगात् । तं वीक्ष्य द्विजा ऊचुः—'अस्माकं समग्रवेदविदामपि भोजः किमपि नार्पयति । भवादृशां हि यथेष्टं दत्ते । ततोऽस्माभिः कवित्वविधानधियात्रागतम् । चिरं विचा- र्य्य पूर्वार्धमभ्यधायि, उत्तरार्धं कृत्वा देहि । ततोऽस्मभ्यं किमपि प्रयच्छ- ति।' इत्युक्त्वा तत्पुरस्तादर्धमभाणि । स च तच्छ्रुत्वा । 'माहिषं च शरच्चन्द्रचन्द्रिकाधवलं दधि' ॥ ८६ ॥ इत्याह । इसी बीच देवमंदिर में प्रणाम करने के लिए कालिदास आ पहुँचे । उन्हें देखकर वे ब्राह्मण बोले—'हम संपूर्ण वेदों के ज्ञाताओं को भी भोज कुछ नहीं देता, आप जैसों को यथेच्छ देता है । सो कविता बनाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं । बहुत देर तक सोच-विचार कर [ श्लोक का ] पूर्वार्द्ध तो बना लिया है, उत्तरार्द्ध तुम बना दो । तो राजा हमको भी कुछ देगा ।' यह कह कर कालिदास के संमुख आधा [ स्वनिर्मित श्लोक ] पढ़ दिया । कालिदास ने वह सुनकर उत्तरार्द्ध कह सुनाया— 'शरत् काल के चंद्र की चाँदनी के समान शुभ्र भैंस का दही भी ।' ते च राजभवनं गत्वा दौवारिकानूचुः—'वयं कवितां कृत्वा समा- गताः । राजानं दर्शयत' इति । ते च कौतुकाद्धसन्तो गत्वा राजानं प्रण- म्य प्राहुः— 'राजमाषनिभैर्दन्तैः कटिविन्यस्तपाणयः । द्वारि तिष्ठन्ति राजेन्द्र च्छान्दसाः श्लोकशत्रवः' ॥ ८७ ॥ इति वे [ ब्राह्मण ] राज भवन में पहुँच कर द्वारपालों से बोले—'हम कविता करके आये हैं । राजा का दर्शन कराओ ।' द्वारपाल कौतुक से हँसते हुए राजा को प्रणाम करके बोले— हे राजेंद्र, राजमाँ [ बड़ा काला उड़द ] के समान दाँतों वाले, कमर पर [ अभद्रता से ] हाथ रखे, श्लोकों के शत्रु तुक्कड़ वेद पाठी द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं ।