भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः ४७ दरिद्रता रूपी आग की जलन तो संतोष के जल से शांत हो गयी है, किंतु माँगनेवालों की आशा नष्ट कर देने से जो अंतर्दाह है, उसका उपशमन किसके द्वारा हो ? राजा चैतस्सर्वं श्रुत्वा 'नेदानीं किमपि दातुं योग्यः । प्रातरेव वाणां पूर्णमनोरथं करिष्यासि ।' इति निष्क्रान्तो राजा— 'कृतो यैर्न च वाग्मी च व्यसनी तं न यैः पदम् । यैरात्मसदृशो नार्थी किं तैः काव्यैर्बलैर्धनैः' ॥ १०४ ॥ राजा ने यह सब सुनकर विचारा कि इस समय तो मैं इसे कुछ देने योग्य हूँ नहीं, प्रातः काल इसका मनोरथ पूर्ण करूँगा—और चला गया— जिस काव्य ने मनुष्य को वक्तृत्व कला में निपुण नहीं बनाया, जिस बल ने किसी को अधीन—स्ववश—नहीं किया और जिस धन ने याचक को अपने समान ( धनी ) नहीं कर दिया, वह काव्य, बल और धन व्यर्थ है । एवं पुरे परिभ्रममाणे राजनि वर्त्मनि चोरद्वयं गच्छति । तयोरेकः प्राह शकुन्तः—'सखे, स्फारान्धकारविततेऽपि जगत्यञ्जनवशात्सर्वं परमा- णुप्रायमपि वस्तु सर्वत्र पश्यामि । परन्तु सम्भारगृहानीतकनकजातमपि न मे सुखाय' इति । जब राजा इस प्रकार नगर में भ्रमण करते फिर रहे थे, तो मार्ग में दो चोर जा रहे थे । उनमें से एक शकुंत नामक चोर बोला--'मित्र, जगत् में घोर अँधेरा फैला होने पर भी अंजन लगा होने के कारण परमाणु जैसी भी छोटी सब वस्तुएँ सर्वत्र देख पा रहा हूँ किंतु कोषागार से चुरा लिया हुआ स्वर्ण भी मुझे सुख नहीं दे रहा है ।' द्वितीयो मरालनामा चोर आह—'आहृतं सम्भारगृहात्कनकजात- मपि न हितमिति कस्माद्धेतोरुच्यते' इति । ततः शकुन्तः प्राह—'सर्वतो नगररक्षकाः परिभ्रमन्ति । सर्वोऽपि जागरिष्यत्येषां भेरीपटहादीनां निनादेन । तस्मादाहृतं विभज्य स्वस्वभागगतं धनमादाय शीघ्रमेव गन्तव्यम्' इति । दूसरे मराल नाम के चोर ने कहा—'खजाने से चुरा लाया गया सोना भी अच्छा नहीं लगता—ऐसा किस कारण से कहते हो ?' तो शकुंत बोला--