भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ भोजप्रबन्धः 'चारों ओर नगर रक्षक घूम रहे हैं। इन नगाड़ों और पटहों के शब्द से सब जग जायेंगे। सो चुराये [ माल ] को बाँट कर अपने-अपने भाग में आये धन को लेकर शीघ्र ही चला जाना उचित होगा।' मरालः प्राह—'सखे, त्वमनेन कोटिद्वयपरिमितमणिकनकजातेन किं करिष्यसि' इति। मराल ने पूछा—'मित्र, तू इस दो करोड़ परिमाण के मणि और सोने से क्या करेगा ? शकुन्तः—'एतद्धनं कस्मैचिद्द्विजन्मने दास्यामि यथायं वेदवेदा- ङ्गपारगोऽन्यं न प्रार्थयति।' शकुंत—यह धन किसी ब्राह्मण को दे दूँगा कि वह वेद और वेदांग का पारंगत होकर किसी और से न माँगेगा। मरालः—'सखे चारु। ददतो युध्यमानस्य पठतः पुलकोऽथ चेत्। आत्मनश्च परेषां च तद्दानं पौरुषं स्मृतम् ॥ १०५ ॥ अनेन दानेन तव कथं पुण्यफलं भविष्यति।' मराल—'मित्र, सुंदर। दान करते, युद्ध करते और काव्य पाठ करते समय यदि अपने और दूसरो के रोंगटे खड़े हो जायँ तभी वह दान, पराक्रम और पाठ कहा जाता है। तो इस [ चोरी के ] दान से तुमको पुण्यफल कैसे मिलेगा?' शकुन्तः—'अस्माकं पितृपैतामहोऽयं धर्मः, यच्चौर्येण वित्तम् नीयते' शकुंत—'चोरी से धनार्जन तो हमारे बाप-दादा से चला आया धर्म है।' मरालः—'शिरश्छेदमङ्गीकृत्यार्जितं द्रव्यं निखिलमपि कथं दीयते।' मराल—'सिर कटाना स्वीकार करके कमाया हुआ सब धन क्यों दान करते हो?' शकुन्तः--मूर्खो नहि ददात्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया। प्राज्ञस्तु वितरत्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया' ॥ १०६ ॥ शकुंत--'मूर्ख मनुष्य दरिद्रता की शंका से धन-दान नहीं करता और बुद्धिमान् पुरुष भविष्य में आनेवाली दरिद्रता के निवारणार्थ धन वितरण कर देता है।'