भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ५५ पञ्चाननस्य सुकवेर्गजमांसैर्नृपश्रिया । पारणा जायते क्वापि सर्वत्रैवोपनासिनः ॥ १२४ ॥ वाहानां पण्डितानां च परेवामपरो जनः । कवीन्द्राणां गजेन्द्राणां ग्राहको नृपतिः परः ॥ १२५ ॥ तदनंतर कभी वृद्धावस्थाके कारण जिसके अंगों के सब जोड़ शिथिल हो चले हैं, ऐसा कोई रामेश्वर नाम का पंडित सभा में पहुँचा और बोला— सब स्थानों पर उपासे ( भूखे ) रहजानेवाले पंचानन सिंह की पारणा ( व्रतांत भोजन ) हाथी के मांस से और कविकी पारणा ( तृप्ति ) राज-संपत्ति से होती है । घोड़ों और अन्य पंडितों का ग्राहक अन्य जन हो सकता है किन्तु कवि- राजों और गजराजों का ग्राहक राजा ही होता है । एवं हि— सुवर्णैः पट्टचैलैश्च शोभा स्याद्वारयोषिताम् । पराक्रमेण दानेन राजन्ते राजनन्दनाः । १२६ ॥ इत्याकर्ण्य राजा रामेश्वरपण्डिताय सर्वाभरणान्युत्तार्य लक्षद्वयं प्रायच्छत् । ततः स्तौति कविः— भोज त्वत्कीर्तिकान्ताया नभोभालस्थितं महत् । कस्तूरीतिलकं राजन्गुणाकर विराजते ॥ १२७ ॥ बुधाग्रे न गुणान्ब्रूयात्साधु वेत्ति यतः स्वयम् । मूर्खाग्रेऽपि च न ब्रूयाद्बुधप्रोक्तं न वेत्ति सः ॥ १२८ ॥ तेन चमत्कृताः सर्वे । ऐसे ही—स्वर्णाभूषणों और पाटांबरों से वेश्याओं की शोभा होती है; राजपुत्र तो पराक्रम और दान से सुशोभित होते हैं। यह सुनकर राजाने रामेश्वर पंडित को उतार कर सारे आभूषण और दो लाख दिये । तब कवि ने स्तुति की—हे गुणों के भांडार भोजराज, आपकी कीर्तिरुपी सुंदरी पत्नी का विशाल तिलक आकाशरूपी माथे पर स्थित हो सुशोभित हो रहा है अर्थात् आपका यश नभोमंडल तक फैला है ।