भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ भोजप्रबन्धः
बुद्धिमान के संमुख स्वगुण कीर्तन उचित नहीं होता, क्यों कि वह तो स्वयं भली भाँति जानता ही है। मूर्ख के आगे भी गुणकथन उचित नहीं क्यों कि वह बुद्धिमान का कहा समझेगा ही नहीं। उसने सब को चमत्कृत कर दिया । रामेश्वरकविः-- 'ख्यातिं गमयति सुजनः सुकविर्विदधाति केवलं काव्यम् । पुष्णाति कमलमम्भो लक्ष्म्या तु रविर्नियोजयति' ॥ १२६॥ ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। कवि रामेश्वर ने सुनाया-- सुकवि तो केवल काव्य रचता है, सज्जन उससे प्रसिद्धि प्राप्त करता है। जल कमल का केवल पोषण करता है परंतु सूर्य उसे लक्ष्मी (शोभा, विकास) से युक्त करता है। तब संतुष्ट राजा ने प्रत्यक्षर एक लाख मुद्राएँ दी। राजेन्द्रं कविः प्राह्- 'कवित्वं न शृणोत्येव कृपणः कीर्तिवर्जितः । नपुंसकः किं कुरुते पुरःस्थितमृगीदृशा' ॥ १३०॥ कविराज भोज से बोला- यशोहीन कृपण, काव्य सुनता ही नहीं, नपुंसक पुरुष संमुख बैठी मृगनयना के साथ क्या करता है ? सीता प्राह— 'हता दैवेन कवयो वराकास्ते गजा अपि । शोभा न जायते तेषां मण्डलेन्द्रगृहं विना' ॥ १३१ ॥ सीता ने कहा-- भाग्य ने उन बेचारे कवियों और हाथियों को भी मार डाला (जिन्हे राजाश्रय नहीं मिला) । मंडलाधीश के घर को छोड़ उनकी शोभा नहीं होती। कालिदासः-- 'अदातृमानसं क्वापि न स्पृशन्ति कवेर्गिरः । दुःखायैवातिवृद्धस्य विलासास्तरुणीकृताः' ॥ १३२॥