भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ५७ कालिदास--कवि की वाणी: ( कविता ) न देनेवाले दाता के मन को छू भी नहीं पाती है। तरुणी के द्वारा किये गए विलास बहुत बूढ़े पुरुष को दुःख ही देते हैं। राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्तवान् । राजा ने प्रत्येक पंडित को लाख-लाख मुद्राएँ दीं। --:o:-- १०--कालिदासस्य कलङ्कनिवारणम्, ततः कदाचिद्राजा समस्तादपि कविमण्डलादधिकं कालिदासमव- लोक्यायान्तं परं वेश्यालोलत्वेन चेतसि खेदत्वं चक्रे । तदा सीता विद्वद्वृन्दवन्दिता तदभिप्रायं ज्ञात्वा प्राह--'देव' दोषमपि गुणवति जने दृष्ट्वा गुणरागिणो न खिद्यन्ते । प्रीत्यैव शशिनि पतितं पश्यति लोकः कलङ्कमपि ॥ १३३ ॥ तुष्टो राजा सीतायै लक्षं ददौ । तदनंतर कभी राजा ने संपूर्ण कविमंडली से भी अधिक महत्त्व शाली कालिदास को आता देखकर परन्तु मन में उनकी वेश्यालोलुपता विचारकर थोड़ी-सी खिन्नता का अनुभव किया। तब विद्वज्जनद्वारा वंदिता सीता ने राजा का अभिप्राय समझ कर कहा-- गुणानुरागी मनुष्य गुणवान व्यक्ति में दोष भी देख कर खिन्न नहीं होते, संसार चंद्रमा में लगे कलंक को उसके प्रति प्रीति के कारण ही देख लेता है। तब संतुष्ट हो राजा ने सीता को लाख लिये । तथापि कालिदासं यथापूर्वं न मानयति यदा, तदा स च कालि- दासो राज्ञोऽभिप्रायं विदित्वा तुलामिषेण प्राह- 'प्राप्य प्रमाणपदवीं को नामास्ते तुलेऽवलेपस्ते । नयसि गरिष्ठमधस्तात्तदितरमुच्चैस्तरांकुरुषे' ॥ १३४ ॥ तो भी राजा पहिले के समान कालिदास का संमान नहीं करता यह बात समझ कर कालिदास ने तुला ( तराजू ) के व्याज से कहा--