भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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५८ भोजप्रबन्धः हे तुले, प्रमाण का पद ( छोटा-बड़ा बताने का काम, मूल्यांकन ) को प्राप्त करके यह तेरी कैसी उद्धतता है कि तू भारी ( गौरवास्पद ) को नीचे ले जाती है ( निम्न घोषित करती है ) और हल्के ( सारहीन ) को ऊपर ( संमाननीय ) उठा देती है । पुनराह-- 'यस्यास्ति सर्वत्र गतिः स कस्मात्स्वदेशरागेण हि याति खेदम् । तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति' ॥१३५॥ फिर कहा--जिसकी गति सर्वत्र समान है ( जो सब स्थानों में मान पाने योग्य है ), वह स्वदेश-प्रेम के कारण क्यों कष्ट उठाये ? 'यह पिता का कुआ है--' ऐसा विचार कर कायर जन ही खारा जल पिया करते हैं। ततो राज्ञा कृतामवज्ञां मनसि विदित्वा कालिदासो दुर्मना निज- वेश्म ययौ। अवज्ञास्फुटितं प्रेम समीकर्तुं क ईश्वरः । सन्धिं न याति स्फुटितं लाक्षालेपेन मौक्तिकम् ॥ १३६ ॥ तदनंतर राजा द्वारा की गयी अवज्ञा ( अवहेलना ) को मन ही मन समझ दुःखी कालिदास अपने घर चला गया । अवहेलना से भग्न प्रेम को जोड़ने में कौन समर्थ होता है ? टूटा मोती लाख लगाने से नहीं जुड़ता । ततो राजापि खिन्नः स्थितः । ततो लीलावती खिन्नं दृष्ट्वा राजानं विषादकारणमपृच्छत् । राजा च रहसि सर्वं तस्यै प्राह। सा च राजमुखेन कालिदासावज्ञां ज्ञात्वा पुनः प्राह--'देव प्राणनाथ, सर्वज्ञोऽसि । स्नेहो हि वरमघटितो न वरं सञ्जातविघटितस्नेहः । हतनयनो हि त्रिपादी न विषादी भवति (१)जात्यन्धः ॥१३७॥ तब राजा भी खिन्न रहने लगा। तदनन्तर राजा को खिन्न देखकर रानी लीलावती ने विषाद का कारण पूछा । एकांत में राजा ने उसे सब कुछ बताया । राजा के मुख से कालिदास की अवहेलना हुई जानकर उसने फिर कहा-- 'देव. प्राणनाथ, आप सर्वज्ञ हैं। ( १ ) जन्मान्ध इति यावत् ।