भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेम यदि उत्पन्न ही न हो तो अच्छा है परन्तु उत्पन्न होकर टूटा स्नेह अच्छा नहीं। जिसकी आँखें न रहे, दुःखी वही होता है, जो जन्मान्ध है, वह नहीं। परन्तु कालिदासः कोऽपि भारत्याः पुरुषावतारः । तत्सर्वभावेन सम्मान- यैनं विद्वद्भिः । पश्य— दोषाकरोऽपि कुटिलोऽपि कलङ्कितोऽपि मित्रावसानसमये विहितोद्योऽपि । चन्द्रस्तथापि हरव (१)ल्लभतामुपैति नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात् ॥ १३८ ॥ परंतु कालिदास तो वाग्देवता का नर रूप में एक अवतार है। तो उसका सब विद्वानों से अधिक सम्मान कीजिए। देखिए--, दोषा रात्रि का करने वाला इस प्रकार ) दोषों का भांडार होने पर भी, वक्र होने पर भी, कलंक युक्त होने पर भी और मित्र (सूर्य) के अस्त होने के समय स्वयम् उदित होने वाला होकर भी (मित्र की अवनति से स्वम् उन्नति कर लेने के दोष से युक्त होकर भी) चंद्रमा ने शिव के प्रेम को प्राप्त कर लिया है। (इससे सिद्ध है) आश्रित जनों के गुण-दोष का विचार नहीं किया जाता। राजा-प्रिये, सर्वमेतत्सत्यमेव' इत्यङ्गीकृत्य 'श्वः कालिदासं प्रातरेव सन्तोषयिष्यामि' इत्यवोचत् । अन्येद्यु राजा दन्तधावनादिविधिं विधाय निर्वार्तितनित्यकृत्यः सभां प्राप । पण्डिताः कवयश्च गायका अन्ये प्रकृतयश्च सर्वे समाजग्मुः । कालिदासमेकमनागतं वीक्ष्य राजा स्वसेवकमेकं तदाकारणाय वेश्यागृहं प्रेषयामास । राजा ने स्वीकारा और कहा—'प्रिये, यह सब सत्य है। कल सबेरे ही कालिदास को संतुष्ट करूँगा।' दूसरे दिन दतुअन आदि करके नित्य कर्म से निपट राजा सभा में पहुँचा। पंडित, कवि, गायक और अन्य सब सामंत-सभासद आ गये। एक (१) महेशनुरागतामित्यर्थः ।