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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

प्रेम यदि उत्पन्न ही न हो तो अच्छा है परन्तु उत्पन्न होकर टूटा स्नेह अच्छा नहीं। जिसकी आँखें न रहे, दुःखी वही होता है, जो जन्मान्ध है, वह नहीं। परन्तु कालिदासः कोऽपि भारत्याः पुरुषावतारः । तत्सर्वभावेन सम्मान- यैनं विद्वद्भिः । पश्य— दोषाकरोऽपि कुटिलोऽपि कलङ्कितोऽपि मित्रावसानसमये विहितोद्योऽपि । चन्द्रस्तथापि हरव (१)ल्लभतामुपैति नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात् ॥ १३८ ॥ परंतु कालिदास तो वाग्देवता का नर रूप में एक अवतार है। तो उसका सब विद्वानों से अधिक सम्मान कीजिए। देखिए--, दोषा रात्रि का करने वाला इस प्रकार ) दोषों का भांडार होने पर भी, वक्र होने पर भी, कलंक युक्त होने पर भी और मित्र (सूर्य) के अस्त होने के समय स्वयम् उदित होने वाला होकर भी (मित्र की अवनति से स्वम् उन्नति कर लेने के दोष से युक्त होकर भी) चंद्रमा ने शिव के प्रेम को प्राप्त कर लिया है। (इससे सिद्ध है) आश्रित जनों के गुण-दोष का विचार नहीं किया जाता। राजा-प्रिये, सर्वमेतत्सत्यमेव' इत्यङ्गीकृत्य 'श्वः कालिदासं प्रातरेव सन्तोषयिष्यामि' इत्यवोचत् । अन्येद्यु राजा दन्तधावनादिविधिं विधाय निर्वार्तितनित्यकृत्यः सभां प्राप । पण्डिताः कवयश्च गायका अन्ये प्रकृतयश्च सर्वे समाजग्मुः । कालिदासमेकमनागतं वीक्ष्य राजा स्वसेवकमेकं तदाकारणाय वेश्यागृहं प्रेषयामास । राजा ने स्वीकारा और कहा—'प्रिये, यह सब सत्य है। कल सबेरे ही कालिदास को संतुष्ट करूँगा।' दूसरे दिन दतुअन आदि करके नित्य कर्म से निपट राजा सभा में पहुँचा। पंडित, कवि, गायक और अन्य सब सामंत-सभासद आ गये। एक (१) महेशनुरागतामित्यर्थः ।

६० भोजप्रबन्धः कालिदास को न आया देख राजा ने उसे बुला लाने के लिए अपने सेवकों में से एक को वेश्या के घर भेजा। स च गत्वा कालिदासं नत्वा प्राह--'कवीन्द्र, त्वामाकारयति भोजनरेन्द्रः' इति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'गतेऽह्नि नृपेणावमा- नितोऽहमद्य प्रातरेवाकारणे किं कारणमिति । यं यं नृपोऽनुरागेण सम्मानयति संसदि । तस्य तस्योत्सारणाय यतन्ते राजवल्लभाः ॥ १३९ ॥ वह पहुँच कर और कालिदास को प्रणाम करके बोला--'कविराज, राजा भोज आपको बुलाते हैं।' तब कवि ने विचारा--'कल राजा ने मुझे अवमानित किया था, आज प्रातः काल ही बुलाने में क्या कारण है ? राजा सभा में प्रेम पूर्वक जिस-जिसका संमान करता है, राजा के प्रेम पात्र व्यक्ति उसी को उखाड़ने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु विशेषतो राज्ञान्वहं मान्यमाने मयि मायाविनो मत्सराद्वैरं बोधयन्ति । अविवेकमतिर्नृपतिर्मन्त्री गुणवत्सु वक्रितग्रीवः । यत्र खलाश्च प्रबलास्तत्र कथं सज्जनावसरः ॥ १४० ॥ इति विचारयन्सभामागच्छत् । परंतु, प्रतिदिन राजा के द्वारा मेरा विशेष रूप से सम्मान होने पर मायावी लोग मेरे साथ ईर्ष्या और वैर मानते हैं। जहाँ अविवेकी (कर्तव्य-बोध-रहित) राजा हो, गुणवानों पर टेढ़ी गरदन किये रहनेवाला (अप्रसन्न) मंत्री हो और जहाँ दुष्ट जन बलवान् पड़ते हों, वहाँ भले व्यक्तियों को अवसर कहाँ ? ऐसा विचार करता हुआ सभा में पहुँचा। ततो दूरे समायान्तं वीक्ष्य सानन्दमासनादुत्थाय 'सुकवे, मत्प्रिय- तम, अद्य कथं विलम्बः क्रियते' इति भाषमाणः पञ्चषट्पदानि सम्मुखो गच्छति ततो निखिलाऽपि सभा स्वासनादुत्थिता । सर्वे सभासदश्च चमत्कृताः। वैरिणश्चास्य विच्छायवदना बभूवुः। ततो राजा निजकर-

भोजप्रबन्धः ६१ कमलेनास्य करकमलमवलम्ब्य स्वासनदेशं प्राप्य तं च सिंहासनमुपवेश्य स्वयं च तदाज्ञया तत्रैवोपविष्टः । तब दूर पर ही उसे आता देख कर आनन्दित हो आसन से उठ कर राजा यह कहता हुआ कि हे सुकवे, मेरे प्रियतम, आज क्यों विलंब किया— 'पाँच-छः डग आगे बढ़ आया । तब संपूर्ण सभा अपने आसन से उठ खड़ी हुई । सब सभासद् चमत्कृत हो गये । वैरी जन के मुँह उतर गये । तब राजा अपने कर कमल से उसके करकमल को पकड़ कर अपने आसन स्थान पर पहुँचा और अपने सिंहासन पर उसे बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से वहीं बैठ गया । ततो राजसिंहासनारूढे कालिदासे बाणकविर्दक्षिणां बाहुमुद्धृत्य प्राह— 'भोजः कलाविद्रुद्रो वा कालिदासस्य माननात् । विबुधेषु कृतो राजा येन दोषाकरोऽप्यसौ' ॥ १४१ ॥ ततोऽस्य विशेषेण विद्वद्भिः सह वैरानलः प्रदीप्तः । तत्पश्चात् कालिदास के राज सिंहासन पर बैठ जाने पर बाण कवि ने दाहिनी भुजा उठा कर कहा— कालिदास का मान करने में कला मर्मज्ञ यह राजा भोज है अथवा रुद्र शिव कि इसने दोषाकर ( रात्रि का करने वाला ) चन्द्रमा के समान दोषाकर ( दोषों के आगार ) इस कालिदास को विद्वानों में राजा बना दिया । तो इस कारण विद्वानों के साथ कालिदास की वैराग्नि और भी दीप्त हो गयी । ततः कैश्चिद्बुद्धिमद्भिर्मन्त्रयित्वा सर्वैरपि विद्वद्भिर्भोजस्य ताम्बूल- वाहिनी दासी धनकनकादिना सम्मानिता । ते च तां प्रत्युपायमूचुः— 'सुभगे, अस्मत्कीर्तिमसौ कालिदासो गलयति । अस्मासु कोऽपि नैतेन कलासाम्यं प्रवहते । वत्से, यथैनं राजा देशान्तरं निःसारयति तद्भवत्या कर्तव्यम्' इति । दासी प्राह—'भवद्भ्यो हारं प्राप्य मया युष्मत्कार्यं क्रियते । तन्मम प्रथमं हारो दातव्यः' इति । ततः सा ताम्बूलवाहिनी तैर्दत्तं हारमादाय व्यचिन्तयत् । तथा हि—'बुद्धेरसाध्यं किं वास्ति ।' तत्पश्चात् कुछ बुद्धिमानों ने सलाह करके सभी विद्वानों द्वारा भोज की तांबूल वाहिका दासी का, धन मान और सुवर्ण आदि देकर संमान कराया ।

६२ भोजप्रबन्धः और फिर उन्होंने उसे उपाय बताया—'हे सुभगे, यह कालिदास हमारे यश को गला रहा है। हममें कोई कला के क्षेत्र में इसके समान नहीं है। सो बच्ची, तुम ऐसा करो कि राजा इसे इस देश से दूसरे देश को निकाल दे।' दासी बोली—'आप लोगों से हार पाकर मेरे द्वारा आपका काम हो सकता है। सो पहिले मुझे हार दीजिए।' तदनन्तर उनके द्वारा दिया हार पाकर वह पानवाली दासी विचार करने लगी कि—'विद्वानों द्वारा असाध्य क्या है?' (विद्वान् क्या नहीं कर सकते ? ) ततः सन्नतिक्रामत्सु कतिपयवासरेषु दैवादेकाकिनि प्रसुप्ते राजनि चरणसंवाहनादिसेवामस्य विधाय तत्रैव कपटेन नेत्रे निमील्य सुप्ता। ततश्चरणचलनेन राजानमीषज्जागरूकं सम्यग्ज्ञात्वा प्राह—'सखि मदन- मालिनि, सादुरात्मा कालिदासो दासीवेषेणान्तः पुरं प्राप्य लीलादेव्या सह रमते। तदनन्तर कुछ दिन बीतने पर भाग्य वश जब राजा अकेला सो गया तो राजा के पैर दबाने आदि सेवा करके तांबूल वाहिका दासी वहीं कपट पूर्वक नेत्र बन्द करके (नींद का बहाना करती) लेट गयी। तत्पश्चात् पैरों के इधर उधर डुलाने से राजा को थोड़ा जागा हुआ भली भाँति समझ कर (सोते-सोते जैसे) कहने लगी—'सखी मदनमालिनी, वह दुष्टात्मा कालिदास दासी के वेष में रनिवास में प्रविष्ट होकर लीला देवी के साथ रमण करता है।' राजा तच्छ्रुत्वोत्थाय प्राह—'तरङ्गवति, किं जागर्षि' इति। सा च निद्राव्याकुलेव न शृणोति। राजा च तस्या अपध्वनिं श्रुत्वा व्यचिन्त- यन्—'इयं तरङ्गवती निद्रायां स्वप्नवशंगता वासनावशाद्देव्याः दुश्चरितं प्राह। स च स्त्रीवेषेणान्तःपुरमागच्छतीत्येतदपि सम्भाव्यते। को नाम स्त्रीचरितं वेद' इति। राजा यह सुन उठ कर बोला—'तरङ्गवती, क्या जाग रही है?' उसने- जैसे कि वह नींद में बेसुध हो, ऐसी स्थिति प्रकट करते हुए—सुना ही नहीं। राजा ने उसकी बर्राहट सुनकर सोचा—'नींद में सपना देखते हुए अवचेतना के वश इस तरंगवती ने रानी के दुश्चरित्र को कह दिया है। वह (कालिदास)

भोजप्रबन्धः ६३ भी स्त्री वेष में अन्तःपुर में आता हो, यह भी संभव है । स्त्री चरित्र को कौन जानता है ?' ततश्चेत्थं विचार्य राजा परेद्युः प्रातरात्मनि कृत्रिमज्वरं विधाय शयानः कालिदासं दासीमुखेनानाय्य तदागमनानन्तरं तथैव लीला- देवीं चानाय्य देवीं प्रत्यवदत्—'प्रिये, इदानीमेव मया पथ्यं भोक्तव्यम्' इति । इत्युक्ते सापि 'तथैव' इति पथ्यं गृहीत्वा राज्ञे रजतपात्रे दत्त्वा तत्र मुद्गदालीं प्रत्यवेषयत् । तत्पश्चात् ऐसा विचार कर दूसरे दिन प्रातः कपटज्वर का बहाना करके लेटे राजा ने दासी द्वारा कालिदास को बुलवा लिया और तत्पश्चात् उसी दासी द्वारा लीला देवी को बुलवा कर देवी से कहा—'प्रिये, इस समय मैं पथ्य-भोजन ही करूँगा ।' राजा के ऐसा कहने पर वह भी 'ठीक है'—यह मान पथ्य लाकर राजा को चांदी पात्र में देकर मूँग की दाल परोसी । ततो राजापि तयोरभिप्रायं जिज्ञासमानः श्लोकार्धं प्राह— 'मुद्गदाली गदव्याली कवीन्द्र वितुषा कथम् ।' इति । तब उन दोनों (रानी-कालिदास) के विचारों के जानने की आकांक्षा से राजा ने आधा श्लोक कहा— 'कविराज, रोग के लिए सर्पिणी तुल्य मूँग की दाल भला क्यों छिलका रहित हुई ?' ततः कालिदासो देव्यां समीपवर्तिन्यामप्युत्तरार्धं प्राह— 'अन्धवल्लभसंयोगे जाता विगतकञ्चुकी' ॥ १४२ ॥ तब रानी के पास बैठे होने पर भी कालिदास ने श्लोक का उत्तरार्द्ध कह दिया—'अन्धा प्रिय होने के कारण इसने चोली उतार दी ।' देवीतच्छ्रुत्वा परिज्ञातार्थस्वरूपा सरस्वतीय तदर्थं विदित्वा स्मेरमुखी मनागिव वभूव । राजाप्येतद् दृष्ट्वा विचारयामास—'इयं पुरा कालिदासे स्निह्यति । अनेनैतस्यां समीपवर्तिन्यामपीत्थमभ्यधायि । इयं च स्मेरमुखी बभूव । स्त्रीणां चरित्रं को वेद । अश्व(१)प्लुतं वासवगर्जितं च स्त्रीणां च चित्तं पुरुषस्य भाग्यम् । अवर्षणं चाप्यतिवर्षणां च देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥ १४३ ॥ (१) अश्वधावनम् ।

६४ भोजप्रबन्धः

रानी उसे सुन अर्थ के स्वरूप को जानने वाली सरस्वती के समान उसका अर्थ समझ कर किंचित् मुस्कुरा दी । राजा ने यह देख कर सोचा-‘यह पहिले से कालिदास से प्रेम करता है; इसीसे इस ( कालिदास ) ने इस ( रानी ) के निकट रहने पर भी इस प्रकार कह डाला । और यह मुस्कुरा दी । स्त्री चरित्र कौन जानता है ? घोड़े की कुदान, वासव ( धनिष्ठा नक्षत्र ) की गरज, स्त्रियों का चित्त, पुरुष का भाग्य, अवृष्टि और अतिवृष्टि—इनको देव नहीं जानता, मनुष्य की तो गिनती क्या ? किन्त्वयं ब्राह्मणो दारुणापराधित्वेऽपि न हन्तव्य इति विशेषेण सरस्वत्याः पुरुषावतारः' इति विचार्य कालिदासं प्राह—'कवे, सर्वथा- स्मद्देशे न स्थातव्यम् । किं बहुनोक्तेन । प्रतिवाक्यं किमपि न वक्तव्यम् । परन्तु कठोर अपराधी होने पर भी इस ब्राह्मण; विशेषतया सरस्वती के पुरुषावतार की हत्या उचित नहीं है, ऐसा विचार कर राजा ने कालिदास से कहा—'कवि, हमारे देश में एक क्षण मत ठहरो । अधिक कहने से क्या ? कोई प्रत्युत्तर मत दो।' ततः कालिदासोऽपि वेगेनोत्थाय वेश्यागृहमेत्य तां प्रत्याह—'प्रिये, अनुज्ञां देहि । मयि भोजः कुपितः स्वदेशे न स्थातव्यमित्युवाच । अहह— अघटितघटितं घटयति सुघटितघटितानि दुर्घटीकुरुते । विधिरैव तानि घटयति तानि पुमान्नैष चिन्त्यति ॥ १४४ ॥ किं च किमपि विद्वद्वृन्दचेष्टितमेवेति प्रतिभाति । तत्पश्चात् कालिदास भी तुरन्त उठ कर वेश्या के घर पहुँच उससे बोला- 'प्रिये, अनुमति दो । क्रुद्ध होकर भोज ने स्वदेश में न रहने की आज्ञा दी है।' अहा— जो घटना न हो सके, उसे घटा देता है और जो सरलता से घट सकती है, उसे दुर्घट बना देता है। जिन्हें पुरुष सोचता भी नहीं, विधाता उन्हें घटित कर देता है । किंतु यह विद्वन्मंडली ने ही कुछ किया है—ऐसा प्रतीत होता है ।

तथा हि— बहूनामल्पसाराणां समवायो ( १ ) दुरत्ययः । तृणैर्विधीयते रज्जुर्बध्यन्ते तेन दन्तिनः ॥ १४५ ॥ और—अल्प बल वाले बहुतों का संगठित होना कठिनता से वश में आ सकने वाला बन जाता है । रस्सी तिनकों से बनायी जाती है किंतु उससे दंतैल हाथी बांध लिये जाते हैं । ततो विलासवती नाम वेश्या तं प्राह— तद्देवांस्य परं मित्रं यत्र सङ्क्रामति द्वयम् । दृष्टे सुखं च दुःखं च प्रतिच्छायेव दर्पणे ॥ दयित, मयि विद्यमानायां किं ते राज्ञा, किं वा राजदत्तेन वित्तेन कार्यम् । सुखेन निःशङ्कं तिष्ठ मद्गृहान्तः कुहरे' इति । ततः कालि- दासस्तत्रैव वसन्कतिपयदिनानि गमयामास । तब विलासवती नाम की वेश्या ने उससे कहा— 'जैसे दर्पण में प्रतिविम्ब संक्रामित हो जाता है, वैसे ही सुख और दुःख— दोनों जिसमें संक्रामित हो जायें, वही सबसे बड़ा मित्र होता है । ( मित्र सुख- दुःख—दोनों का समान अनुभव करने वाला ही होता है । ) स्वामी, मेरे रहते क्या काम तुम्हें राजा से और क्या लेना तुम्हें राजा के धन से ? मेरे घर के गुप्त आगार में सुख पूर्वक शंका त्याग कर रहो ।' सो वहीं रहते कालिदास ने कुछ दिन बिता दिये । ततः कालिदासे गृहान्निर्गते राजानं लीलादेवी प्राह—'देव, कालि- दासकविना साकं नितान्तं निविडतमा मैत्री । तदिदानीमनुचितं कस्मात्कृतं यस्य देशेऽप्यवस्थानं निषिद्धम् । इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि पर्वणि यथा रसविशेषः । तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानां च विपरीता ॥ १४७ ॥ शोकारातिपरित्राणं प्रीतिविस्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १४८ ॥ ( १ ) अत्येतुमशक्यः । ५ भोज०

६६ भोजप्रबन्धः

तदनन्तर कालिदास के घर से चले जाने पर राजा से लीला देवी ने कहा- 'महाराज, कालिदास के साथ आपकी बहुत घनी मित्रता है। सो इस सम किस लिए उसका देश में रहना भी आपने अनुचित रूप से निषिद्ध कर दिया जैसे गन्ने की फुलची ( ऊपरी भाग ) से क्रमशः नीचे के पोरों में र ( मिठास ) बढ़ता जाता है, वैसे ही सज्जनों की मित्रता क्षण-क्षण बढ़ जाती है और सज्जनों के विपरीत, जो दुर्जन हैं, उनकी इससे विपरी घटती है। शोक रूपी शत्रु से त्राण दिलाने वाले, प्रेम और विश्वास के पात्र दो अक्ष के रत्न 'मित्र' की सृष्टि किसने की है ?' राजाप्येतल्लीलादेवीवचनमाकर्ण्य प्राह - 'देवि, केनापि ममेत्यभि धायि यत्कालिदासो दासीवेषेणान्तःपुरमासाद्य देव्या सह रमते' इति मया चैतद्व्यापारजिज्ञासया कपटज्वरेणायं भवती च वीक्षितौ । तत समीपवर्तिन्यामपि त्वय्युत्तरार्धमित्थं प्राह। तच्चाकर्ण्य त्वयापि कृतं हासः। ततश्च सर्वमेतद्दृष्ट्वा ब्राह्मणहननभीरुणा मया देशान्निःसा रितः। त्वां च न दाक्षिण्येन हन्मि' इति । लीलादेवी के ऐसे वचन सुनकर राजा ने भी कहा-'रानी किसी ने मुझ यह कहा कि कालिदास दासी वेष में रनिवास में पहुँचकर रानी के साथ रम करता है। मैंने इस बात को जानने की आकांक्षा से ज्वर का बहाना कर उसे और आपको देखा। तब तुम्हारे निकट में उपस्थित रहने पर भी उस ऐसा श्लोक का उत्तरार्द्ध पढ़ा। और उसे सुनकर तुम भी मुस्कुरा दीं। त यह सब देखकर ब्राह्मण वध के डर से मैंने उसे देश से निकाल दिया, औ तुम्हें मैं उदारता के कारण नहीं मार रहा हूँ।' ततो हासपरा देवी चमत्कृता प्राह - 'निःशङ्कं देव, अहमे धन्या यस्यास्त्वं पतिरीदृशः । यत्त्वया भुक्तशीलाया मम मनः कथमन्तः गच्छति । यतः सर्वकामिनीभिरपि कान्तोपभोगे स्मर्तव्योऽसि । अहा देव, त्वं यदि मां सतीमसतीं वा कृत्वा गमिष्यसि, तर्ह्यहं सर्वथा मरिष्ये इति । ततो राजापि 'प्रिये, सत्यं वदसि' इति । ततः स नृपतिः पुरुषै रहिमानयामास। तप्तं लोहगोलकं कारयामास। धनुश्च सज्जं चक्रे ।

भोजप्रबन्धः ६७ तदनन्तर हँसती हुई रानी आश्चर्य में पड़कर बोली-महाराज, निःसन्देह मैं धन्य हूँ, जिसके आप ऐसे पति हैं। आपके द्वारा भोगी जाने वाली मेरा मन और कहीं कैसे जायेगा, क्योंकि आप तो प्रियोपभोग काल में सभी कामिनियों द्वारा स्मरण किये जाने योग्य हैं ? हाय महाराज, यदि आप मुझ सती को असती ठहरा कर चले जायेंगे तो फिर मैं मर ही जाऊँगी।' तब राजा ने भी कहा—'प्रिये, तुम सच कहती हो।' तत्पश्चात् राजा ने सेवकों से सर्प मँगवाया, लोहे का गोला गर्म करवाया और धनुष को चढ़ाकर रखा : ततो देवी स्नाता निजपातिव्रत्यानलेन देदीप्यमाना सुकुमारगात्री सूर्यमवलोक्य प्राह-'जगच्चक्षुस्त्वं सर्वं वेत्सि । जाग्रति स्वप्नकाले च सुषुप्तौ यदि मे पतिः । भोज एव परं नान्यो मच्चित्ते भावितोऽस्ति न ॥ १४६ ॥ इत्युक्त्वा ततो दिव्यत्रयं चक्रे । ततः शुद्धायामन्तःपुरे लीलावत्यां लज्जानतशिरा नृपतिः पश्चात्तापात्पुरः 'देवि, क्षमस्व पापिष्ठं माम् । किं वदामि' इति कथयामास । तदनंतर स्नान करके अपने पतिव्रत रूपी अग्नि से दीप्त होती सुकुमार शरीरवाली रानी सूर्य को देखकर बोली-, जगत् के नेत्र आप सब जानते हो । जागते, स्वप्न देखते अथवा सोते समय यदि भोज ही मेरे पति हैं, तो किसी अन्य का विचार भी मैंने किया है या नहीं-यह स्पष्ट करो।' ऐसा कहके उसने तीनों प्रकार की परिक्षाएँ दीं। तब अंतःपुर में देवी लीलावती को शुद्ध प्रमाणित पा लाज से सिर झुकाये, पछताता हुआ राजा बोला- 'देवि, मुझ पापी को क्षमा करो। क्या कहूँ ?' राजा च तदाप्रभृति न निद्राति, न च भुङ्क्ते, न केनचिद्वक्ति । केवलमुद्विग्नमनाः स्थित्वा दिवानिशं प्रलपति- 'किं नाम मम लज्जा, किं नाम दाक्षिण्यम्, क्व गाम्भीर्यम् । हा हा कवे, कविकोटिमुकुटमणे, कालिदास, हा हा मम प्राणसम हा । मूर्खेण किमश्राव्यं श्रावितोऽसि । अवाच्यमुक्तोऽसि' इति प्रसुप्त इव ग्रहग्रस्त इव, मायाविध्वस्त इव, पपात । ततः प्रियाकरकमलसिक्तजलसञ्जातसंज्ञः कथमपि तामेव प्रियां वीक्ष्य स्वात्मनिन्दापरः परमतिष्ठत् ।

६८ भोजप्रबन्धः

तब से राजा न सोता था, न भोजन करता था और न किसी से बोलता ही था । उन्मन हो बैठ कर केवल दिन रात विलाप करता था—'मुझे कैसी लज्जा, कैसी मेरी उदारता और कहां मेरी गंभीरता ? हाय, कवि, कवियों के मुकुटमणि, कालिदास, मेरे प्राण-तुल्य, हाय ! मुझ मूर्ख ने तुम्हें क्या न सुनने योग्य सुनाया, अकथनीय कहा ?' इस प्रकार सोया हुआ जैसा, ग्रह गृहीत जैसा, माया से विनष्ट जैसा गिर पड़ता । तब फिर प्रिय रानी के कर-कमलों द्वारा छिड़के गये जल से सुधि पाकर और उसी प्रिया को देखकर अपनी निंदा करता हुआ किसी प्रकार चला रहा था । ततो निशानाथहीनेव निशा, दिनकरहीनेव दिनश्रीः, वियोगिनीव योषित्, शक्ररहितेव सुधर्मा, न भाति भोजभूपालसभा रहिता कालि- दासेन । तदाप्रभृति न कस्यचिन्मुखे काव्यम् । न कोऽपि विनोदसुन्दरं वचो वक्ति । तब फिर जैसे रात्रि के स्वामी ( चंद्र ) से रहित रात्रि हो, दिन के कर्त्ता ( सूर्य ) से रहित जैसे दिवसलक्ष्मी हो, जैसे कोई वियोगिनी हो, जैसे इंद्र से रहित देव सभा हो, ऐसे ही कालिदास से रहित राजा भोज की सभा अच्छी न लगने लगी । तब से किसी के मुख में काव्य रहा ही नहीं । कोई विनोदपूर्ण सुन्दर वाक्य तक न बोलता था । ततो गतेषु केषुचिद्दिनेषु कदाचिद्राकापूर्णेन्दुमंडलं पश्यन्पुरश्च लीलादेवीमुखेन्दुं वीक्ष्य प्राह— 'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।' कुत्र च पूर्णेऽपि चन्द्रमसि नेत्रविलासाः, कदा वाचो विलसितम् ! प्रातश्चोत्थितः प्रातर्विधीन्विधाय सभां प्राप्य राजा विद्वद्वरान्प्राह—'अहो कवयः, इयं समस्या पूर्यताम् ।' ततः पठति— ( १ ) 'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।' पुनराह—'इयं चेत्समस्या न पूर्यते भवद्भिर्मद्देशे न स्थातव्यम्' इति । ततो भीतास्ते कवयः स्वानि गृहाणि जग्मुः । तदनंतर कुछ दिन बीतने पर कभी पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमंडल और संमुख लीलादेवी के मुखचंद्र को देखकर राजाने ( एक पद ) कहा— ( १ ) तुलनामन्वन्तरति, ग्लौसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः ।

'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।' पूरे चांद में भी इस जैसे नयनों के विलास कहाँ हैं और कब होता है ऐसा वाणी विलास ! तत्पश्चात् प्रातः उठ कर और प्रातः कृत्य समाप्त करके सभा में पहुँच राजा विद्वद्वरों से बोला—'हे कविजन, इस समस्या की पूर्ति करो,' और पढ़ा— 'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।' फिर कहा—'यदि आप इस समस्या की पूर्ति नहीं कर सकते, तो मेरे देश में रहना उचित नहीं है।' तब डरे हुए वे कवि अपने-अपने घर गये। चिरं विचारितेऽप्यर्थे कस्यापि नार्थसङ्गतिः स्फुरति। ततः सर्वैर्मिलित्वा बाणः प्रेषितः। ततः सभां प्राप्याह राजानम्—'देव, सर्वैर्विद्वद्भि रहं प्रेषितः। अष्टवासरानावधिमभिधेहि । नवमेऽह्नि पूरयिष्यन्ति ते । न चेद्देशान्नि- र्गच्छन्ति ।' ततो राजा 'अस्तु' इत्याह । ततो बाणस्तेषां विज्ञाप्य राज- सन्देशं स्वगृह्मगात् । ततोऽष्टौ दिवसा अतीताः । अष्टमदिनरात्रौ मिलि- तेषु कविषु बाणः प्राह--'अहो तारुण्यमदेन राजसंमानप्रमादेन किञ्चि- द्विद्यामदेन कालिदासो निःसारितोऽभवत् । समे भवन्तः सर्व एव कवयः। विषमे स्थाने तु स एक एव कविः । तं निःसार्येदानीं किं नाम महत्त्व- मासीत् । स्थिते तस्मिन् कथमियमवस्थास्माकं भवेत् । तन्निःसारे या या बुद्धिः कृता सा भवद्भिरेवानुभूयते । सामान्यविप्रविद्वेषे कुलनाशो भवेत्किल । उमारूपस्य विद्वेषे नाशः कविकुलस्य हि ॥ १५० ॥ बहुत समय तक अर्थ विचारते रहने पर भी किसी को भी अर्थ की संगति का स्फुरण नहीं हुआ । तब सबने मिलकर बाण को भेजा वह सभा में जाकर राजा से बोला—'महाराज, सब विद्वानों ने मुझे भेजा है। आठ दिन का अवसर दीजिए। वे नवें दिन समस्या पूर्ति कर देंगे, अन्यथा देश से निकल जायेंगे।' तब राजा ने कहा--'ठीक है।' तदनंतर बाण राजा का संदेश उन्हें बताकर अपने घर चला गया । फिर आठ दिन बीत गये । आठवें दिन की रात में उन कवियों के मिलने पर बाण ने कहा—'अरे, तरुणाई के मद अथवा राज संमान के प्रमाद अथवा कुछ विद्या के मद के कारण आपने कालिदास को निकलवा दिया । सहज स्थान में तो आप सभी कवि

७० भोजप्रबन्धः हैं, विषमस्थान में तो वही एक कवि है। उसे निकलवाकर आपने अब कौन-सी बड़ाई पा ली। उसके रहने पर हमारी यह दशा क्यों होती? उसे निकलवाने में जो-जो बुद्धि लगायी, उसका अनुभव अब आपको ही हो रहा है। सामान्य ब्राह्मण से विद्वेष रखने पर निश्चय ही कुलनाश होता है। उमा रूप ब्राह्मण द्वेष से कवि कुल का नाश होता है। ततः सर्वे गाढं कलहायन्ते स्म मयूराद्यश्च। ततस्ते सर्वान्कलहा- न्निवार्य सद्यः प्राहुः—‘अद्यैवावधिः पूर्णाः कालिदासमन्तरेण न कस्य- चित्सामर्थ्यमस्ति समस्यापूरणे। सङ्ग्रामे सुभटेन्द्राणां कवीनां कविमण्डले। दीप्तिर्वा दीप्तिहानिर्वा मुहूर्त्तेनैव जायते॥ १५१॥ यदि रोचते ततोऽद्यैव मध्यरात्रे प्रमुदितचन्द्रमसि निगूढमेव गच्छामः सम्पत्तिसम्भारमादाय। यद् न गम्यते श्वो राजसेवका अस्मान् बलान्निःसारयन्ति। तदा देहमात्रेणैवास्माभिर्गन्तव्यम्। तदद्य मध्यरात्रे गमिष्यामः।' इति सर्वे निश्चित्य गृहमागत्य बलीवर्दव्यूढेषु शकटेषु सम्पद्धामारोप्य रात्रावेव निष्क्रान्ताः। तदनंतर सब मयूर आदि कवि डटकर आपस में झगड़ने लगे। तब वे सब झगड़ना छोड़कर तुरंत बोले—‘आज ही अवधि पूर्ण हुई है और समस्यापूर्ति की सामर्थ्य कालिदास को छोड़कर किसी में भी है नहीं। सुभटराजों की युद्ध में और कवियों की कवि मंडली में तेजोमयता अथवा तेजो हानि मुहूर्तभर में ही हो जाती है। सो यदि आप लोग ठीक समझें तो आज ही आधी रात को चंद्रमा के उदित होने पर चुपचाप संपत्ति सामग्री ले करके निकल चलें। यदि नहीं जायेंगे तो कल राज सेवक हमें बल पूर्वक निकाल बाहर करेंगे। तब फिर हमें अपना शरीरमात्र लेकर जाना पड़ेगा। सो आज आधी रात को निकल चलेंगे।' ऐसा निश्चय कर घर पहुँच बैलगाड़ियों पर संपत्ति सामग्री लाद- कर सब रात को ही निकल पड़े। ततः कालिदासस्तत्रैव रात्रौ विलासवतीसदनोद्याने वसन् पथि गच्छतां तेषां गिरं श्रुत्वा वेश्याचेटीं प्रेषितवान्—‘प्रिये, पश्य क एते

गच्छन्ति ब्राह्मणा इव।' ततः सा समेत्य सर्वानपश्यत् । उपेत्य च कालिदासं प्राह-- एकेन राजहंसेन या शोभा सरसोऽभवत् । न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥ १५२ ॥ सर्वे च बाणमयूरप्रमुखाःपलायन्ते, नात्र संशयः' इति । कालिदासः- 'प्रिये, वेगेन वासांसि भवनादानय, यथा पलायमानान्विप्रान्रक्षामि । किं पौरुषं रक्षति यो न (१) वार्तान किं वा धनं नार्थिजनाय यत्स्यात् । सा किं क्रिया या न (२) हितानुबद्धा किं जीवितं साधुविरोधि यद्वै ॥१५३॥ तब कालिदास रात में वहीं विलासवती की गृहवाटिका में रह रहा था, उसने रास्ते में जाते उन सब कवियों की बातचीत सुनकर वेश्या की दासी को भेजा--'प्रिये, ये कौन ब्राह्मण जैसे जा रहे हैं?' तब उसने जाकर सबको देखा और कालिदास के पास पहुँचकर कहा-- एक राजहंस से सरोवर की जैसी शोभा होती है वैसी चारों ओर तीर पर एकत्र सहस्रों बगुलों से नहीं । सब बाण, मयूर आदि कवि भागे जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं । कालिदास ने कहा--'प्रिये, शीघ्रतया घर से वस्त्र लेकर आओ कि इन भागे जाते विप्रों की रक्षा कर सकूँ । जो दुःखियों की रक्षा न करे, वह पौरुष कैसा और जो याचकों के काम न आ सके, वह धन कैसा ? वह कर्म भी क्या, जिससे हित न हो सके और उस जीवन से क्या लाभ, जिससे सज्जन-विरोध हो ?' ततः स कालिदासश्चारणवेषं विधाय खड्गमुद्वहन्क्रोशाधमुत्तरं गत्वा तेषामभिमुखमागत्य सर्वान्निरूप्य 'जय' इत्याशीर्वचनमुदीर्य पप्रच्छ चार- णभाषया - 'अहो विद्यावारिधयः, भोजसभायां सम्प्राप्तमहत्त्वातिशयाः, बृहस्पतय इव सम्भूय कुत्र जिगमिषवो भवन्तः । कच्चित्कुशलं वः । राजा च कुशली। अस्माभिः काशोदेशादागम्यते भोजदर्शनाय वित्तस्पृहया च । तब कालिदास ने चारण का वेष बना, खड्ग-धारण कर आधे कोस उत्तर जा, उनके संमुख पहुँच कर सबको देखा और 'जय' यह आशीर्वचन ( १ ) वा आर्तान् इति च्छेदः । ( २ ) या हितं नानुवध्नाति ।

७२ भोजप्रबन्धः कह कर चारणों की भाषा में पूछा—'हे विद्या के सागर विद्वानो, भोज की सभा में अतिशय महत्त्व पा वृहस्पति के समान होकर आप लोग कहाँ जाने की इच्छा कर रहे हैं ? आप लोग सकुशल हैं न ? राजा भी कुशल पूर्वक है ! हम भी भोज के दर्शन और धन की आकांक्षा से काशी-देश से आ रहे हैं।' ततः परिहासं कुर्वन्तः सर्वे निष्क्रान्ताः । ततस्तेषु कश्चित्तद्गिरमा- कर्ण्य तं च चारणं मन्यमानः कुतूहलेन विपश्चित्प्राह—'अहो चारण' शृणु । 'त्वया पश्चादपि श्रोष्यत एव । अतो मयाद्यैवोच्यते । राजा किलैभ्यो विद्वद्भ्यः पूरणाय समस्योक्ता । तत्पूरणाशक्ताः कुपितराज्ञो भयाद्देशा- न्तरे क्वचिज्जिगमिषव एते निष्चक्रमुः' । तब वे सब परिहास करते हुए चले गये, परंतु उनमें से कोई एक विद्वान् उसके वचन सुनकर उसे चारण मानता हुआ कुतूहल पूर्वक बोला—'अरे चारण, सुनो । तुम को बाद में तो सुनना ही होगा, इसलिए मैं आज ही कहे देता हूँ । राजा ने पूर्ति के निमित्त इन विद्वानों से एक समस्या कही । उसकी पूर्ति में असमर्थ ये क्रुद्ध राजा के डर से कहीं दूसरे देश में जाने की इच्छा से निकल पड़े हैं । चारणः—'राज्ञा का वा समस्या प्रोक्ता । ततः पठति स विपश्चित्— 'तुलणं अण अणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एढ़ाए।' चारणः—'एतत् साध्वेव गूढार्थम् । एतत्पूर्णेन्दुमण्डलं वीक्ष्य राज्ञापाठि। एतस्योत्तरार्धमिदं भवितुमर्हति— 'अणु इति वण्णयदि कहं अणुकिति तस्स प्पडिपदि चन्दस ॥' सर्वे श्रुत्वा चमत्कृताः । ततश्चारणः सर्वान्प्रणिपत्य निर्ययौ । चारण ने पूछा—'राजा ने कौन सी समस्या कही ?' तब उस विद्वान् ने पढ़ा—'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।' चारण—इसका गूढ़ अर्थ ठीक ही है । राजा ने पूर्ण चंद्र-मंडल देख कर इसे पढ़ा । इसका उत्तरार्द्ध यह होना उचित है :— 'प्रति पद को प्रतिक्षीण चंद्रमा—नहीं सुमुखि-—मुख तुल्य ।' सुनकर सब- चमत्कृत हो गये । फिर चारण सबको प्रणाम करके चला गया ।

भोजप्रबन्धः ७३ ततः सर्वे विचारयन्ति स्म-अहो, इयं साक्षात्सरस्वती पुंरूपेण सर्वेषामस्माकं परित्राणायागता । नायं भवितुमर्हतिमर्त्यः । अद्यापि किमपि केनापि न ज्ञायते। ततः शीघ्रमेव गृहमासाद्य शकटेभ्यो भारमुत्तार्य प्रातः सर्वैरपि राजभवनमागन्तव्यम् । न चेच्चारण एव निवेदयिष्यति । ततो झदिति गच्छाम।' इति योजयित्वा तथा चक्रुः । तब वे सब विचारने लगे--'अहो, यह साक्षात् सरस्वती ही पुरुष रूप में हमारी रक्षा के लिए आयी थी । यह मनुष्य नहीं हो सकता । अभी तक किसी को कुछ भी नहीं मालूम हुआ है । सो शीघ्र ही घर पहुँच और गाड़ियों से समान उतार कर प्रभात में सबको राज भवन में पहुँचना ठीक होगा, अन्यथा चारण ही निवेदन कर देगा । सो झट चल देते हैं।' ऐसी योजना बनाकर उन्होंने उसी के अनुसार किया । ततो राजसभां गत्वा राजानमालोक्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा विविशुः । ततो बाणः प्राह--'देव, सर्वज्ञेन यत्त्वया पठ्यते तदीश्वर एव वेद । केऽमी वराका उदरम्भरयो द्विजाः । तथाप्युच्यते- तुलणं (१) अणु अणुसरइ ग्लोसो मुहचन्दस्स खु एदाए । अणु इंदि वण्णयदि कहं अणुकितिं तस्सप्पडिवदि चन्दस्स ॥१५४॥ तदनन्तर वे राजा सभा में जाकर राजा को देख 'स्वस्ति' ऐसा कह कर बैठ गये । तब बाण बोला--'महाराज, सर्वज्ञ आपके द्वारा जो पढ़ा गया, उसे तो ईश्वर ही जानता है, हम बेचारे पेट भरू ब्राह्मणों की तो गणना ही क्या ? तथापि निवेदन है-- 'कभी न हो सकता है चंदा इस मुखेंदु के तुल्य । प्रतिपद को प्रतिक्षीण चंद्रमा--नहीं सुमुखि, मुख तुल्य ।' राजा यथाव्यवसितस्याभिप्रायं विदित्वा 'सर्वथा कालिदासो दिवसप्रा- प्यस्थाने निवसति । उपायैश्च सर्वं साध्यम्' इत्याह । ततो बाणाय रु- क्माणां पञ्चदशलक्षाणि प्रादात् । सन्तोषमिषेणैव विद्वद्वृन्दं स्वं स्वं सदनं प्रेषितम् । (१) तुलनामन्वनुसरति ग्लोसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः । अन्विति वर्ण्यते कथमनुकृतिस्तस्य प्रतिपदि चन्द्रस्य ॥ इति च्छाया।

७४ भोजप्रबन्धः गते च विद्वन्मण्डले शनैर्द्वारपालायादिष्टं राज्ञा-'यदि केचिद्विज- न्मान आयास्यन्ति तदा गृहमध्यमानेतव्याः ।' राजा ने यथोचित अभिप्राय जान कर सोचा--'निश्चय ही कालिदास एक दिन की पहुँच के स्थान पर है। उपायों से सब सिद्ध हो सकता है।' तत्पश्चात् बाण को पंद्रह लाख के स्वर्ण भूषण दिये और संतोष प्रकट करते हुए विद्वत्-समाज को अपने-अपने घर भेज दिया । विद्वानों की मंडली के चले जाने पर धीरे से राजा ने द्वारपाल को आदेश दिया--'यदि कोई ब्राह्मण आये तो उसे महल में ले आना ।' ततः सर्वमपि वित्तमादाय स्वगृहं गते वाणे केचित्पण्डिता आहुः- 'अहो, वाणेनानुचितं व्यवधायि । यदसावप्यस्माभिः सह नगरान्नि- ष्क्रान्तोऽपि सर्वमेव धनं गृहीतवान् । सर्वथा भोजस्य वाणस्वरूपं ज्ञापयिष्यामः । यथा कोऽपि नान्यायं विधत्ते विद्वत्सु ।' ततस्ते राजा- नमासाद्य ददृशुः । राजा तान्प्राह-'एतत्स्वरूपं ज्ञातमेव । भवद्भैर्यथा- र्थतया वाच्यम् ।' ततस्तैः सर्वमेव निवेदितम् । तत्पश्चात् समग्र धन लेकर वाण के अपने घर चले जाने पर कुछ पंडित बोले--'अरे, वाण ने अनुचित किया कि नगर से तो हमारे साथ ही निकला पर समग्र धन स्वयं ले लिया । भोज को वाण का सच्चा रूप हम ज्ञापित करेंगे, जिससे कि फिर कोई विद्वानों के साथ अन्याय न करे।' फिर वे राजा के पास पहुँचे और निवेदन किया । राजा ने उनसे कहा-यह तो जानता ही था, आप ठीक-ठीक सब बता दीजिए ।' सो उन्होंने सब कुछ बता दिया । ततो राजाविचारितवान्-'सर्वथाकालिदासश्चारणवेषेण मद्भया- न्मदीयनगरमध्य आस्ते ।' ततश्चाङ्गरक्षकानादिदेश-'अहो, पलाय्यन्तां तुरङ्गाः ।' ततः क्रीडोद्यानप्रयाणे पटहध्वनिरभवत्-'अहो, इदानीं राजा देव- पूजाव्यग्र इति शुश्रुमः । पुनरिदानीं क्रीडोद्यानं गमिष्यति' इति व्याकुलाः सर्वे भटाः सम्भूय पश्चाद्यान्ति । ततो राजा तैर्विद्वद्भिः सहाश्वमारुह्य रात्रौ यत्र चारणप्रसङ्गः समजनि, तत्प्रदेशं प्राप्तः । तब राजा ने विचारा--'निश्चय ही कालिदास मेरे भय के कारण चारण के वेष में नगर में ही हैं।' और फिर उसने अङ्ग रक्षकों को आज्ञा दी--

भोजप्रबन्धः ७५ 'घोड़े दौड़ाओ।' तत्पश्चात् क्रीड़ा-उद्यान जाने के समय से संबद्ध नगाड़े का घोष हुआ- 'इस समय राजा देव-पूजा में व्यग्र हैं, ऐसा सुनते हैं कि पुनः अभी क्रीडा-उद्यान में जायेंगे, सो एकत्र हो सभी भट अनुगमनार्थ प्रस्तुत हो गये। तब राजा विद्वानों के साथ घोड़े पर चढ़ कर उस प्रदेश में पहुँचा, जहाँ रात्रि को चारण की घटना हुई थी। ततो राजा चरतां चौराणां पदज्ञाननिपुणानाहूय प्राह- 'अनेन वर्त्मना यः कोऽपि रात्रौ निर्गतस्तस्य पदान्यद्यापि दृश्यन्ते, तानि पश्यन्तु' इति। ततो राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्त्वा तान्प्रेषयित्वा च स्वभवनमगात्। ते च पदज्ञा राजाज्ञया सर्वतश्चरन्तोऽपि तमन्वेक्ष- माणा विमूढा इवासन्। तब राजा ने चोरों के आने-जाने से बने पैरों के चिह्नों की पहिचान करने में निपुण व्यक्तियों को बुलाकर कहा- 'इस मार्ग से कोई रात में गया है, उसके पैरों के चिह्न आज भी दीख रहे हैं, उन्हें खोजो।' राजा ने प्रत्येक पंडित को लाख-लाख दिया उन्हें भेज कर अपने महल को लौट गया। वे पद- चिह्न-ज्ञानी व्यक्ति राजा की आज्ञा से सब ओर घूमघाम कर भी पद-चिह्न वाले व्यक्ति को न ढूँढ पाये और मूर्ख बन बैठे। ततश्च लम्बमाने सवितरि कामपि दासीमेकं पदत्राणं त्रुटितमादाय चर्मकारवेश्म गच्छन्तीं दृष्ट्वा तुष्टा इवासन्। ततस्तत्पदत्राणं तया चर्मकारकरे न्यस्तं वीक्ष्य तैश्च तस्याः करान्मिषेणादाय रेणुपूर्णे पथि मुक्त्वा तदेव पदं तस्येति ज्ञात्वा तां च दासीं क्रमेण, वेश्याभवनं विश- न्तीं वीक्ष्य तस्या मन्दिरं परितो वेष्टयामासुः। ततश्च तैः क्षणेन (१) भोजश्रवणपथविषयमभिज्ञानवार्ता प्रापिता। ततो राजा सपरैः सामात्यः पद्भ्यामेव विलासवतीभवनमगात्। फिर वे सूरज-ढले एक दासी को एक फटा जूता लेकर चमार के घर जाती हुई देखकर कुछ प्रसन्न हुए। उस जूते को उसके द्वारा चमार के हाथ में रखा देख उन्होंने बहाने से उसके हाथ से उसे लिया और धूल भरे रास्ते में छोड़ कर और (इस प्रकार उसकी छाप से) समझ लिया कि वह पद चिह्न (१) भोजप्रतीत्यर्थः ।

इसी (जूते के स्वामी का है और यथा क्रम दासी को वेश्या के घर में घुसती देखकर उस (वेश्या गृह) आवास को चारों से घेर लिया। फिर क्षण भर में उन्होंने राजा भोज के कानों तक इस जान कारी का समाचार भेज दिया। तब राजा पुरवासियों और मंत्रियों के साथ पैदल ही विलासवती के घर गया। ततस्तच्छ्रुत्वा विलासवतीं प्राह कालिदासः—'प्रिये, मत्कृते किं कष्टं ते पश्य।' विलासवती—'सुकवे, उपस्थिते विप्लव एव पुंसां समस्तभावः परिमीयतेऽतः । अवाति वायौ नहि (१) तूलराशेर्गिरेरेश्च कश्चित्प्रतिभाति भेदः ॥१५५॥ मित्रस्वजनबन्धूनां बुद्धेर्धैर्यस्य चात्मनः । आपन्निकषपाषाणे जनो जानाति सारताम् ॥ १५६ ॥ अप्रार्थितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनः । सुखानि च तथा मन्ये दैन्यमत्रातिरिच्यते ॥ १५७ ॥ सुकवे, राज्ञा त्वयि मनाङ्निराकृते वचसापि मया सदेहं दासीवृन्दं प्रदीप्तवह्रौ पतिष्यति।' कालिदासः—'प्रिये, नैवं मन्तव्यम्। मां दृष्ट्वा विकासीकृतास्यो भोजः पादयोः पतिष्यति' इति। फिर यह सुनकर कालिदास ने विलासवती से कहा—'प्रिये, देखो, मेरे लिए तुम्हें कैसा कष्ट हो रहा है।' विलासवती ने कहा—'हे सुकवि, विपत्ति के उपस्थित होने पर ही मनुष्यों के सब भावों का मूल्यांकन हो पाता है; जब तक हवा नहीं चलती, रूई के ढेर और पहाड़ में कोई अंतर ही नहीं मालूम होता । मनुष्य मित्र, स्वजन, भाई-बंधु, बुद्धि और धीरज का तथा अपना सार आपत्ति रूपी कसौटी पर कसकर जान पाता है । जैसे मनुष्य के पास विना प्रार्थना किये ही दुःख आ जाते हैं, वैसे ही सुख भी। सो इस समय दीन भाव का अनुभव अतिरेक प्रतीत होता है । हे सुकवि, यदि वचनों से भी राजा के द्वारा आपका थोड़ा सा भी अनादर हुआ तो मैं सशरीर दासियों के साथ जलती आग में गिर जाऊँगी।' कालिदास ने कहा—'प्रिये, ऐसा मत समझो। मुझे देख कर भोज प्रसन्न वदन हो पैरों पर गिरेगा।'


(१) कार्पाससमूहस्य ।

भोजप्रबन्धः ७७

ततो वेश्यागृहं प्रविश्य भोजः कालिदासं दृष्ट्वा सम्भ्रममाश्लिष्य पादयोः पतति । स राजा पठति च— 'गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा । मा भून्मनः कदाचिन्मे त्वया विरहितं कवे ॥ १५८ ॥ कालिदासस्तच्छ्रुत्वा ( १ ) व्रीडाधोमुखस्तिष्ठति । राजा च कालिदासमुखमुन्नमय्याह— 'कालिदास कलावास दासवाच्चालितो यदि । राजमार्गे व्रजन्नत्र परेषां तत्र का त्रपा ॥ १५६ ॥ धन्यां विलासिनीं मन्ये कालिदासो यदेतया । निबद्धः स्वगुणैरेष शकुन्त इव पञ्जरे ॥ १६० ॥ तत्पश्चात् भोज वेश्या के घर में प्रविष्ट हो कालिदास को देखा और संभ्रम के साथ के घर में प्रविष्ट हो कालिदास के पैरों में गिरा और कहा— 'चलते अथवा बैठते, जागते अथवा सोते हे कविराज, मेरा मन कभी तुमसे वियुक्त न हो ।' यह सुन कर कालिदास ने लाज से मुँह नीचा कर लिया । राजा ने कालिदास का मुख ऊँचा करके कहा— 'हे कला के आवास स्थान कालिदास, यदि दास के समान राज मार्ग में तुमने चला दिया तो इसमें औरों को लज्जा की क्या बात है ? मैं विलासनी को धन्य मानता हूँ कि इसने अपने गुणों से कालिदास को पिंजरे में पक्षी के समान निबद्ध कर लिया ।' राजा नेत्रयोर्हर्षाश्रु मार्जयति कराभ्यां कालिदासस्य । ततस्तत्प्राप्ति- प्रसन्नो राजा ब्राह्मणेभ्यः प्रत्येकं लक्षं ददौ । निजतुरगे च कालिदासमा- रोप्य सपरिवारो निजगृहं ययौ । राजा ने कालिदास के नेत्रों से प्रसन्नता के आँसू पोंछे और फिर उसके मिल जाने से प्रसन्न हो ब्राह्मणों को एक-एक लाख दिये । ओर अपने घोड़े पर कालिदास को बैठा कर परिवार सहित अपने महलों को लौट गया । —:०:— ( १ ) व्रीडया-लज्जया, अवनतं मुखं यस्य स इति विग्रहः ।

७८ भोजप्रबन्धः ११- विदुषां सत्कारः-कतिपयकथा कियत्यपि कालेऽतिक्रान्ते राजा कदाचित्सन्ध्यामालोक्य प्राह- 'परिपतति पयोनिधौ पतङ्गः' ततो बाणः प्राह- 'सरसिरुहामुदरेषु मत्तभृङ्गः।' ततो महेश्वरकविः-- 'उपवनतरुकोटरे विहङ्गः' ततः कालिदासः प्राह-- 'युवतिजनेषु शनैःशनै (१) रनङ्गः' ॥ १६१ ॥ तुष्टो राजा लक्षं लक्षं ददौ। चतुर्थचरणस्य लक्षद्वयं ददौ। कुछ समय व्यतीत हो जाने पर कभी राजा ने संध्याकाल को देखकर कहा- 'गिरता हैं जल निधि में पतंग (सूर्य)।' तब बाण ने कहा-'सरसिज-उदरों में मत्तभृंग।' इस पर महेश्वर कवि बोला-'उपवन-तरु-कोटर में विहंग।' अन्त में कालिदास ने कहा-'तरुणी जन में क्रम-क्रम अनंग।' संतुष्ट राजा ने लाख-लाख मुद्राएँ दीं, चौथे चरण पर दो लाख दिये कदाचिद्राजा बहिरुद्यानमध्ये मार्गे प्रत्यागच्छन्तं कमपि विप्रं ददर्श । तस्य करे चर्ममयं कमण्डलुं वीक्ष्य तं चातिदरिद्रं ज्ञात्वा मुखश्रिया विराजमानं चावलोक्य तुरङ्गं तदग्रे निधायाह- विप्र, चर्मपात्रं किमर्थं पाणौ वहसि' इति। स च विप्रो नूनं मुखशोभया मृदूक्त्या च भोज इति विचार्याह-- 'देव, वदान्यशिरोमणौ भोजे पृथ्वीं शासति लोहताम्राभावः समजति । तेन चर्ममयं पात्रं वहामि, इति। राजा-- 'भोजे शासति लोहताम्राभावे को हेतुः।' तदा विप्रः पठति-- अस्य श्रीभोजरोजस्य द्वयमेव सुदुर्लभम्। शत्रूणां शृङ्खलैर्लोहं ताम्रं शासनपत्रकैः' ॥ १६२ ॥ ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। (१) मन्मथः ।