भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

६४ भोजप्रबन्धः

रानी उसे सुन अर्थ के स्वरूप को जानने वाली सरस्वती के समान उसका अर्थ समझ कर किंचित् मुस्कुरा दी । राजा ने यह देख कर सोचा-‘यह पहिले से कालिदास से प्रेम करता है; इसीसे इस ( कालिदास ) ने इस ( रानी ) के निकट रहने पर भी इस प्रकार कह डाला । और यह मुस्कुरा दी । स्त्री चरित्र कौन जानता है ? घोड़े की कुदान, वासव ( धनिष्ठा नक्षत्र ) की गरज, स्त्रियों का चित्त, पुरुष का भाग्य, अवृष्टि और अतिवृष्टि—इनको देव नहीं जानता, मनुष्य की तो गिनती क्या ? किन्त्वयं ब्राह्मणो दारुणापराधित्वेऽपि न हन्तव्य इति विशेषेण सरस्वत्याः पुरुषावतारः' इति विचार्य कालिदासं प्राह—'कवे, सर्वथा- स्मद्देशे न स्थातव्यम् । किं बहुनोक्तेन । प्रतिवाक्यं किमपि न वक्तव्यम् । परन्तु कठोर अपराधी होने पर भी इस ब्राह्मण; विशेषतया सरस्वती के पुरुषावतार की हत्या उचित नहीं है, ऐसा विचार कर राजा ने कालिदास से कहा—'कवि, हमारे देश में एक क्षण मत ठहरो । अधिक कहने से क्या ? कोई प्रत्युत्तर मत दो।' ततः कालिदासोऽपि वेगेनोत्थाय वेश्यागृहमेत्य तां प्रत्याह—'प्रिये, अनुज्ञां देहि । मयि भोजः कुपितः स्वदेशे न स्थातव्यमित्युवाच । अहह— अघटितघटितं घटयति सुघटितघटितानि दुर्घटीकुरुते । विधिरैव तानि घटयति तानि पुमान्नैष चिन्त्यति ॥ १४४ ॥ किं च किमपि विद्वद्वृन्दचेष्टितमेवेति प्रतिभाति । तत्पश्चात् कालिदास भी तुरन्त उठ कर वेश्या के घर पहुँच उससे बोला- 'प्रिये, अनुमति दो । क्रुद्ध होकर भोज ने स्वदेश में न रहने की आज्ञा दी है।' अहा— जो घटना न हो सके, उसे घटा देता है और जो सरलता से घट सकती है, उसे दुर्घट बना देता है। जिन्हें पुरुष सोचता भी नहीं, विधाता उन्हें घटित कर देता है । किंतु यह विद्वन्मंडली ने ही कुछ किया है—ऐसा प्रतीत होता है ।