भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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तथा हि— बहूनामल्पसाराणां समवायो ( १ ) दुरत्ययः । तृणैर्विधीयते रज्जुर्बध्यन्ते तेन दन्तिनः ॥ १४५ ॥ और—अल्प बल वाले बहुतों का संगठित होना कठिनता से वश में आ सकने वाला बन जाता है । रस्सी तिनकों से बनायी जाती है किंतु उससे दंतैल हाथी बांध लिये जाते हैं । ततो विलासवती नाम वेश्या तं प्राह— तद्देवांस्य परं मित्रं यत्र सङ्क्रामति द्वयम् । दृष्टे सुखं च दुःखं च प्रतिच्छायेव दर्पणे ॥ दयित, मयि विद्यमानायां किं ते राज्ञा, किं वा राजदत्तेन वित्तेन कार्यम् । सुखेन निःशङ्कं तिष्ठ मद्गृहान्तः कुहरे' इति । ततः कालि- दासस्तत्रैव वसन्कतिपयदिनानि गमयामास । तब विलासवती नाम की वेश्या ने उससे कहा— 'जैसे दर्पण में प्रतिविम्ब संक्रामित हो जाता है, वैसे ही सुख और दुःख— दोनों जिसमें संक्रामित हो जायें, वही सबसे बड़ा मित्र होता है । ( मित्र सुख- दुःख—दोनों का समान अनुभव करने वाला ही होता है । ) स्वामी, मेरे रहते क्या काम तुम्हें राजा से और क्या लेना तुम्हें राजा के धन से ? मेरे घर के गुप्त आगार में सुख पूर्वक शंका त्याग कर रहो ।' सो वहीं रहते कालिदास ने कुछ दिन बिता दिये । ततः कालिदासे गृहान्निर्गते राजानं लीलादेवी प्राह—'देव, कालि- दासकविना साकं नितान्तं निविडतमा मैत्री । तदिदानीमनुचितं कस्मात्कृतं यस्य देशेऽप्यवस्थानं निषिद्धम् । इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि पर्वणि यथा रसविशेषः । तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानां च विपरीता ॥ १४७ ॥ शोकारातिपरित्राणं प्रीतिविस्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १४८ ॥ ( १ ) अत्येतुमशक्यः । ५ भोज०

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