भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ भोजप्रबन्धः
तदनन्तर कालिदास के घर से चले जाने पर राजा से लीला देवी ने कहा- 'महाराज, कालिदास के साथ आपकी बहुत घनी मित्रता है। सो इस सम किस लिए उसका देश में रहना भी आपने अनुचित रूप से निषिद्ध कर दिया जैसे गन्ने की फुलची ( ऊपरी भाग ) से क्रमशः नीचे के पोरों में र ( मिठास ) बढ़ता जाता है, वैसे ही सज्जनों की मित्रता क्षण-क्षण बढ़ जाती है और सज्जनों के विपरीत, जो दुर्जन हैं, उनकी इससे विपरी घटती है। शोक रूपी शत्रु से त्राण दिलाने वाले, प्रेम और विश्वास के पात्र दो अक्ष के रत्न 'मित्र' की सृष्टि किसने की है ?' राजाप्येतल्लीलादेवीवचनमाकर्ण्य प्राह - 'देवि, केनापि ममेत्यभि धायि यत्कालिदासो दासीवेषेणान्तःपुरमासाद्य देव्या सह रमते' इति मया चैतद्व्यापारजिज्ञासया कपटज्वरेणायं भवती च वीक्षितौ । तत समीपवर्तिन्यामपि त्वय्युत्तरार्धमित्थं प्राह। तच्चाकर्ण्य त्वयापि कृतं हासः। ततश्च सर्वमेतद्दृष्ट्वा ब्राह्मणहननभीरुणा मया देशान्निःसा रितः। त्वां च न दाक्षिण्येन हन्मि' इति । लीलादेवी के ऐसे वचन सुनकर राजा ने भी कहा-'रानी किसी ने मुझ यह कहा कि कालिदास दासी वेष में रनिवास में पहुँचकर रानी के साथ रम करता है। मैंने इस बात को जानने की आकांक्षा से ज्वर का बहाना कर उसे और आपको देखा। तब तुम्हारे निकट में उपस्थित रहने पर भी उस ऐसा श्लोक का उत्तरार्द्ध पढ़ा। और उसे सुनकर तुम भी मुस्कुरा दीं। त यह सब देखकर ब्राह्मण वध के डर से मैंने उसे देश से निकाल दिया, औ तुम्हें मैं उदारता के कारण नहीं मार रहा हूँ।' ततो हासपरा देवी चमत्कृता प्राह - 'निःशङ्कं देव, अहमे धन्या यस्यास्त्वं पतिरीदृशः । यत्त्वया भुक्तशीलाया मम मनः कथमन्तः गच्छति । यतः सर्वकामिनीभिरपि कान्तोपभोगे स्मर्तव्योऽसि । अहा देव, त्वं यदि मां सतीमसतीं वा कृत्वा गमिष्यसि, तर्ह्यहं सर्वथा मरिष्ये इति । ततो राजापि 'प्रिये, सत्यं वदसि' इति । ततः स नृपतिः पुरुषै रहिमानयामास। तप्तं लोहगोलकं कारयामास। धनुश्च सज्जं चक्रे ।