भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ६७ तदनन्तर हँसती हुई रानी आश्चर्य में पड़कर बोली-महाराज, निःसन्देह मैं धन्य हूँ, जिसके आप ऐसे पति हैं। आपके द्वारा भोगी जाने वाली मेरा मन और कहीं कैसे जायेगा, क्योंकि आप तो प्रियोपभोग काल में सभी कामिनियों द्वारा स्मरण किये जाने योग्य हैं ? हाय महाराज, यदि आप मुझ सती को असती ठहरा कर चले जायेंगे तो फिर मैं मर ही जाऊँगी।' तब राजा ने भी कहा—'प्रिये, तुम सच कहती हो।' तत्पश्चात् राजा ने सेवकों से सर्प मँगवाया, लोहे का गोला गर्म करवाया और धनुष को चढ़ाकर रखा : ततो देवी स्नाता निजपातिव्रत्यानलेन देदीप्यमाना सुकुमारगात्री सूर्यमवलोक्य प्राह-'जगच्चक्षुस्त्वं सर्वं वेत्सि । जाग्रति स्वप्नकाले च सुषुप्तौ यदि मे पतिः । भोज एव परं नान्यो मच्चित्ते भावितोऽस्ति न ॥ १४६ ॥ इत्युक्त्वा ततो दिव्यत्रयं चक्रे । ततः शुद्धायामन्तःपुरे लीलावत्यां लज्जानतशिरा नृपतिः पश्चात्तापात्पुरः 'देवि, क्षमस्व पापिष्ठं माम् । किं वदामि' इति कथयामास । तदनंतर स्नान करके अपने पतिव्रत रूपी अग्नि से दीप्त होती सुकुमार शरीरवाली रानी सूर्य को देखकर बोली-, जगत् के नेत्र आप सब जानते हो । जागते, स्वप्न देखते अथवा सोते समय यदि भोज ही मेरे पति हैं, तो किसी अन्य का विचार भी मैंने किया है या नहीं-यह स्पष्ट करो।' ऐसा कहके उसने तीनों प्रकार की परिक्षाएँ दीं। तब अंतःपुर में देवी लीलावती को शुद्ध प्रमाणित पा लाज से सिर झुकाये, पछताता हुआ राजा बोला- 'देवि, मुझ पापी को क्षमा करो। क्या कहूँ ?' राजा च तदाप्रभृति न निद्राति, न च भुङ्क्ते, न केनचिद्वक्ति । केवलमुद्विग्नमनाः स्थित्वा दिवानिशं प्रलपति- 'किं नाम मम लज्जा, किं नाम दाक्षिण्यम्, क्व गाम्भीर्यम् । हा हा कवे, कविकोटिमुकुटमणे, कालिदास, हा हा मम प्राणसम हा । मूर्खेण किमश्राव्यं श्रावितोऽसि । अवाच्यमुक्तोऽसि' इति प्रसुप्त इव ग्रहग्रस्त इव, मायाविध्वस्त इव, पपात । ततः प्रियाकरकमलसिक्तजलसञ्जातसंज्ञः कथमपि तामेव प्रियां वीक्ष्य स्वात्मनिन्दापरः परमतिष्ठत् ।