भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ भोजप्रबन्धः
तब से राजा न सोता था, न भोजन करता था और न किसी से बोलता ही था । उन्मन हो बैठ कर केवल दिन रात विलाप करता था—'मुझे कैसी लज्जा, कैसी मेरी उदारता और कहां मेरी गंभीरता ? हाय, कवि, कवियों के मुकुटमणि, कालिदास, मेरे प्राण-तुल्य, हाय ! मुझ मूर्ख ने तुम्हें क्या न सुनने योग्य सुनाया, अकथनीय कहा ?' इस प्रकार सोया हुआ जैसा, ग्रह गृहीत जैसा, माया से विनष्ट जैसा गिर पड़ता । तब फिर प्रिय रानी के कर-कमलों द्वारा छिड़के गये जल से सुधि पाकर और उसी प्रिया को देखकर अपनी निंदा करता हुआ किसी प्रकार चला रहा था । ततो निशानाथहीनेव निशा, दिनकरहीनेव दिनश्रीः, वियोगिनीव योषित्, शक्ररहितेव सुधर्मा, न भाति भोजभूपालसभा रहिता कालि- दासेन । तदाप्रभृति न कस्यचिन्मुखे काव्यम् । न कोऽपि विनोदसुन्दरं वचो वक्ति । तब फिर जैसे रात्रि के स्वामी ( चंद्र ) से रहित रात्रि हो, दिन के कर्त्ता ( सूर्य ) से रहित जैसे दिवसलक्ष्मी हो, जैसे कोई वियोगिनी हो, जैसे इंद्र से रहित देव सभा हो, ऐसे ही कालिदास से रहित राजा भोज की सभा अच्छी न लगने लगी । तब से किसी के मुख में काव्य रहा ही नहीं । कोई विनोदपूर्ण सुन्दर वाक्य तक न बोलता था । ततो गतेषु केषुचिद्दिनेषु कदाचिद्राकापूर्णेन्दुमंडलं पश्यन्पुरश्च लीलादेवीमुखेन्दुं वीक्ष्य प्राह— 'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।' कुत्र च पूर्णेऽपि चन्द्रमसि नेत्रविलासाः, कदा वाचो विलसितम् ! प्रातश्चोत्थितः प्रातर्विधीन्विधाय सभां प्राप्य राजा विद्वद्वरान्प्राह—'अहो कवयः, इयं समस्या पूर्यताम् ।' ततः पठति— ( १ ) 'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।' पुनराह—'इयं चेत्समस्या न पूर्यते भवद्भिर्मद्देशे न स्थातव्यम्' इति । ततो भीतास्ते कवयः स्वानि गृहाणि जग्मुः । तदनंतर कुछ दिन बीतने पर कभी पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमंडल और संमुख लीलादेवी के मुखचंद्र को देखकर राजाने ( एक पद ) कहा— ( १ ) तुलनामन्वन्तरति, ग्लौसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः ।