भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

भोजप्रबन्धः ७७

ततो वेश्यागृहं प्रविश्य भोजः कालिदासं दृष्ट्वा सम्भ्रममाश्लिष्य पादयोः पतति । स राजा पठति च— 'गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा । मा भून्मनः कदाचिन्मे त्वया विरहितं कवे ॥ १५८ ॥ कालिदासस्तच्छ्रुत्वा ( १ ) व्रीडाधोमुखस्तिष्ठति । राजा च कालिदासमुखमुन्नमय्याह— 'कालिदास कलावास दासवाच्चालितो यदि । राजमार्गे व्रजन्नत्र परेषां तत्र का त्रपा ॥ १५६ ॥ धन्यां विलासिनीं मन्ये कालिदासो यदेतया । निबद्धः स्वगुणैरेष शकुन्त इव पञ्जरे ॥ १६० ॥ तत्पश्चात् भोज वेश्या के घर में प्रविष्ट हो कालिदास को देखा और संभ्रम के साथ के घर में प्रविष्ट हो कालिदास के पैरों में गिरा और कहा— 'चलते अथवा बैठते, जागते अथवा सोते हे कविराज, मेरा मन कभी तुमसे वियुक्त न हो ।' यह सुन कर कालिदास ने लाज से मुँह नीचा कर लिया । राजा ने कालिदास का मुख ऊँचा करके कहा— 'हे कला के आवास स्थान कालिदास, यदि दास के समान राज मार्ग में तुमने चला दिया तो इसमें औरों को लज्जा की क्या बात है ? मैं विलासनी को धन्य मानता हूँ कि इसने अपने गुणों से कालिदास को पिंजरे में पक्षी के समान निबद्ध कर लिया ।' राजा नेत्रयोर्हर्षाश्रु मार्जयति कराभ्यां कालिदासस्य । ततस्तत्प्राप्ति- प्रसन्नो राजा ब्राह्मणेभ्यः प्रत्येकं लक्षं ददौ । निजतुरगे च कालिदासमा- रोप्य सपरिवारो निजगृहं ययौ । राजा ने कालिदास के नेत्रों से प्रसन्नता के आँसू पोंछे और फिर उसके मिल जाने से प्रसन्न हो ब्राह्मणों को एक-एक लाख दिये । ओर अपने घोड़े पर कालिदास को बैठा कर परिवार सहित अपने महलों को लौट गया । —:०:— ( १ ) व्रीडया-लज्जया, अवनतं मुखं यस्य स इति विग्रहः ।