भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित भाग्येश गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य की उन्नति में कुछ कमी बनी रहती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से गुरु तृतीयभाव को देखता है, परन्तु व्ययेश होने के कारण भाई तथा पराक्रम के क्षेत्र में भी त्रुटिपूर्ण सफलता देता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं संतान पक्ष का सहयोग मिलता है। नवमीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता मिलती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मेष लग्नः द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ भी होता है। पांचवीं मित्रदृष्टि से गुरु चतुर्थ- भाव को देखता है, अतः जातक को माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखता है, अतः शत्रुपक्ष में जातक अपनी समझदारी से सफलता प्राप्त करता है। नवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक के आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। ऐसी स्थिति का जातक हरक्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता पाता है। 'मेष' लग्न में 'शुक्र' 'मेष'- लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक सुन्दर शरीर वाला, सम्मानित, बलिष्ठ तथा चतुर होता है। सातवीं दृष्टि से शुक्र स्वराशि वाले सप्तम भाव को देखता है, अतः जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं परन्तु शुक्र के धनेश होने के कारण व्यवसाय तथा कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कठिनाइयां भी आती रहती हैं।