भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में स्वराशि स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक धनी, कुटुम्बवान तथा सौभाग्यशाली होता है, परन्तु शुक्र के बन्धनेश के साथ सप्तमेश भी होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठि- नाइयाँ भी आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से शुक्र अष्टमभाव को देखता है, अतः जातक को स्वयोग्यता के कारण ही आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ मिलता है। संक्षेप में, ऐसा जातक धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मेष लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम, चातुर्य, साहस एवं भाई-बहिनों की वृद्धि होती है, परन्तु सप्तमेश होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ भी आती हैं। सातवीं समदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक भाग्यवान तथा धर्मात्मा भी होता है। संक्षेप में, ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धार्मिक, पराक्रमी, धनी तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाला होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मेष लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथेभाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है, परन्तु शुक्र के द्वितीयेश तथा केन्द्रस्थ होने के कारण धन एवं कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता रहता है। इसी प्रकार स्त्री तथा व्यवसाय के सुख में भी कुछ न्यूनता बनी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव की देखने के कारण जातक की राज्य तथा पिता के क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्नति होती है।