भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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११३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक धनी तथा कुटुम्बवान होता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि एवं भवन से सुख में कुछ कमी आती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व का लाभ होने पर भी जातक को अशान्तियों का सामना करना पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादश- भाव को देखने से जातक की आयु में वृद्धि होती है। संक्षेप में ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी तथा ऐश्वर्यवान होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश 'मेष' लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित दशमेश तथा एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक का पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। साथ ही पिता, राज्य द्वारा सहयोग मिलता है। तीसरी शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान पक्ष में कमी रहती है। सातवीं शत्रु दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं तथा दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से कारण खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थान के सम्बन्ध भी असन्तोषजनक रहते हैं। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथेभाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को माता तथा भूमि-भवन के साधनों में कुछ कमी रहती है, परन्तु सुख में वृद्धि होती है। तीसरी मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष से लाभ होता है तथा शत्रुओं पर प्रभाव बना रहता है। सातवीं दृष्टि स्वराशि वाले दशमभाव में पड़ने से पिता राज्य व्यवसाय एवं सामान के क्षेत्र में वृद्धि होती रहती है। दसवीं नीचदृष्टि से लग्न को देखने के कारण जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा वह चिन्ताओं का भी कुछ शिकार बना रहता है।