भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि का फलादेश मेष लग्नः पंचमभावः शनि पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित त्रिकोणस्थ शनि के प्रभाव से जातक को विद्या एवं बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान पक्ष से मतभेद रहता है। तीसरी उच्चदृष्टि से मित्रराशि से सप्तमभाव को देखने के कारण व्यवसाय एवं स्त्री पक्ष में सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादशभाव की देखने से आमदनी के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है तथा राज्य एवं पिता से भी लाभ होता है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब का भी खूब लाभ होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्न : षष्ठभावः शनि छठेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित दशमेश तथा एकादशेश शनि से प्रभाव से जातक को पिता के साथ वैमनस्य रहता है तथा राज्य पक्ष में कठिनाई से सफलता मिलती है। परन्तु आमदनी अच्छी रहती है तथा शत्रुओं पर विजय भी मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कठिनाइयों से सफलता मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक होता है तथा बाहरी संबंधों से असन्तोष रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव की देखने से कारण पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। ऐसा जातक बड़ा हिम्मती तथा प्रभावी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्नः सप्तमभावः शनि सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित दशमेश तथा एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक को व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में विशेष सफलता मिलती है। पिता तथा राज्य से बहुत लाभ होता है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में कुछ कठिनाइयां आती हैं। सातवीं नीचदृष्टि से शत्रु मंगल की राशि वाले प्रथमभाव को देखने से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने से माता, भूमि एवं भवन के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है तथा घरेलू सुखों में भी कमी आती है।