भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११५ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक को पुरातत्व एवं आयु का तो लाभ होता है, परन्तु आमदनी के क्षेत्र में कमी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि वाले दशम भाव को देखने के कारण राज्य तथा पिता-पक्ष से अल्प लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं कुटुम्ब के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या तथा सन्तान पक्ष में त्रुटि रहती है। ऐसा जातक जवान का तेज तथा क्रोधी भी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेष लग्न : नवमभाव : शनि नवमभाव में शत्रु बुध की राशि में स्थित शनि के प्रभाव से जातक के भाग्य की आरम्भ में कम तथा बाद में विशेष उन्नति होती है। धर्म का पालन भी कम ही होता है। पिता तथा राज्य द्वारा लाभ मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण आमदनी अच्छी रहती है तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति भी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि के साथ भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है तथा दसवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। संक्षेप, ऐसी ग्रह स्थिति का जातक शत्रुजयी, यशस्वी तथा धनी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित शनि का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : शनि दसवेंभाव में स्वराशिस्य शनि के प्रभाव से जातक पिता तथा राज्य द्वारा विशेष शान्ति तथा लाभ प्राप्त करता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी-स्थानों के संबंध असंतोषजनक रहते हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि, भवन के सुख में कमी रहती है तथा दसवीं उच्चदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलता मिलती है। संक्षेप में ऐसा जातक ऐश्वर्यवान्, विलासी तथा सुखी जीवन बिताने वाला होता है।