भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 638 में से

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११९ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेषलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में स्वराशि स्थित दशमेश शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है। उसे पिता तथा राज्य द्वारा भी यथेष्ट लाभ मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से शत्रु की राशि वाले प्रथमभाव को देखने से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या तथा संतान पक्ष में भी त्रुटि बनी रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु की वृद्धि तो होती है, परन्तु पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है एवं दैनिक जीवन में कठिनाइयां भी आती रहती हैं। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मेषलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अत्यधिक होता है तथा बाहरी स्थानों, पिता एवं राज्य के पक्ष से भी हानि उठानी पड़ती है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव से देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। सातवीं मित्रदृष्टि से छठेभाव को देखने से शत्रुपक्ष में प्रभाव स्थापित होता है तथा दसवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं तथा विशेष परिश्रम द्वारा थोड़ी ही सफलता मिल पाती है। 'मेष' लग्न में 'राहु' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। हृदय में विभिन्न प्रकार की चिन्तायें भी बनी रहती हैं। ऐसा जातक झूठ, फरेब तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला तथा बड़ा हिम्मती होता है।

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