भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१२७ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक धन सम्बन्धी चिन्ताओं तथा अनेक प्रकार से संकटों से ग्रस्त बना रहता है। कौटुम्बिक क्लेश भी भोगने पड़ते हैं। परन्तु बारम्बार हानि उठाकर भी जातक अन्त में अपने युक्तिबल से धनी क्षतिपूर्ति करने में समर्थ हो जाता है तथा समाज में धनी व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित भी होता है।

'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में उच्चस्थ राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है तथा उसे भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा हिम्मती, साहसी, युक्तिबल में प्रवीण तथा अपनी भीतरी कमजोरी को प्रकट न करने वाला होता है और अपने इन्हीं गुणों के कारण सफलता भी प्राप्त करता है।

'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रुराशिस्थ राहु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी का शिकार होना पड़ता है। घरेलू शान्ति भी नहीं रहती। वह मानसिक-अशान्तियों का शिकार बना रहता है तथा गुप्त- युक्तियों का आश्रय लेकर भी अधिक सफल नहीं हो पाता।

'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की विद्या के क्षेत्र में बड़ी कठिनाइयों के बाद भी थोड़ी ही सफलता मिल पाती है। उसे सन्तान पक्ष से भी कष्ट होता है। परन्तु अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर वह सामान्य सफलतायें प्राप्त करता रहता है। ऐसा जातक कम पढ़ा-लिखा तथा परेशानियों में फँसा रहने वाला होता है।