भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : षष्ठभाव : राहु छठेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक अपने शत्रु-पक्ष में हिम्मत, बहादुरी तथा गुप्त युक्तियों से काम लेकर प्रभाव स्थापित करता है तथा कठिन परिस्थितियों में भी अपने धैर्य को नहीं छोड़ता। ऐसा व्यक्ति बारम्बार मुसीबतों का शिकार बनता रहता है, परन्तु अपने साहस एवं धैर्य के बल पर उन सब पर विजय भी पाता रहता है। 'मेष' लग्न की कुंडली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : सप्तमभाव : राहु सातवेंभाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में चिन्ता एवं कष्टों का शिकार होता है, परन्तु अपनी गुप्त-युक्तियों के बल पर उन कठिनाइयों का निराकरण करता है। व्यक्ति के पारिवारिक-जीवन में अनेक कठिनाइयां आती हैं तथा जैसे-तैसे ही निर्वाह हो पाता है। 'मेष' लग्न की कुंडली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : अष्टमभाव : राहु आठवेंभाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की जीवन में अनेक बार मृत्यु- तुल्य कष्टों का शिकार होना पड़ता है। एक के बाद दूसरी मुसीबत घेरे रहती है तथा पुरातत्त्व विषयक हानि भी उठानी पड़ती है। वह गुप्त-युक्तियों का आश्रय लेता है, फिर भी उसकी चिन्ताओं एवं परेशानियों का अन्त नहीं हो पाता। 'मेष' लग्न की कुंडली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : नवमभाव : राहु नवेंभाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक कठिनाइयां उपस्थित होती रहती हैं। धर्म पालन में भी श्रद्धा नहीं रहती। उसे बारम्बार अपयश, कष्ट, निराशा एवं अपमान का सामना करना पड़ता है तथा अत्यधिक दुःख उठाते रहने के बावजूद भी बहुत कम सफलतायें मिल पाती हैं।