भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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११६ 'मेष' लग्न की कुंडली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को पिता तथा राज्य के पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा नौकरी, व्यवसाय एवं प्रतिष्ठा के क्षेत्र में भी बहुत संकट आते हैं। ऐसे जातक को भाग्योन्नति में बहुत कम सफलता मिलती है तथा अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं। २७६ 'मेष' लग्न की कुंडली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की आमदनी बहुत अच्छी रहती है, परन्तु उसके लिए उसे कठोर परिश्रम भी करना पड़ता है। कभी-कभी लाभ के स्थान पर हानि के योग भी उपस्थित होते हैं। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक मितव्ययी, परिश्रमी, धनी तथा स्वार्थी होता है। २८० 'मेष' लग्न की कुंडली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मेषलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को खर्च की अधिकता के कारण बहुत कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं तथा बाहरी स्थानों के संबंध से भी कष्ट मिलता है। बीच-बीच में कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना तथा ठाठ-बाट से रहना—ये दोनों बातें भी साथ-साथ चलती हैं, परन्तु ऋण एवं व्यय के बोझ से मुक्ति नहीं मिल पाती। २८१ 'मेष' लग्न में 'केतु' 'मेष' लग्न की कुंडली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फल मेषलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शारीरिक-कष्ट, मानसिक-चिन्तायें तथा अन्य प्रकार की परेशानियों का शिकार बना रहता है। उसके शरीर में कहीं चोट भी लगती है तथा सौन्दर्य में भी कमी आ जाती है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती, परिश्रमी तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला होता है, परन्तु फिर भी अनेक त्रुटियों का शिकार बना रहता है। २८२