भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१२० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शारीरिक-कष्ट, चिन्ता, धन, की कमी, कौटुम्बिक परेशानी एव झगड़ो का शिकार बना रहता है, परन्तु अपने युक्ति-बल से आर्थिक स्थित में थोड़ा-बहुत सुधार कर लेता है। भीतर से चिन्तित, निर्धन तथा दुःखी रहने पर भी वह अपनी असलियत को प्रकट नहीं होने देता, फलतः लोग उसे धनवान ही समझते रहते हैं। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित नीच के केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई- बहिन के पक्ष में कमजोरी आती है तथा वह भीरु स्वभाव का होता है। गुप्त-युक्तियों के आश्रय से स्वार्थ साधन करना ही उसका उद्देश्य होता है, परन्तु अत्यधिक परिश्रम करने पर भी उसे सफलता बहुत कम ही मिल पाती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में बहुत कमी रहती है तथा कुटुम्ब के विषय में भी अशान्तिबनी रहती है। चन्द्रमा की राशि पर केतु के होने कारण जातक का मनोबल बना रहता है, अतः उसी के बल पर वह अपने संकट का समय निकालता है। ऐसा जातक अपना देश छोड़ कर विदेश में भी जा सकता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन में कठिनाइयां आती हैं। स्मरणशक्ति निर्बल होने के कारण वह अधिक विद्या प्राप्त नहीं कर पाता तथा सन्तानपक्ष से भी दुःखी रहता है। इस ग्रह स्थिति का जातक स्वभाव से उग्र तथा कठोर वचन बोलने वाला होता है। अत्यन्त परिश्रम करने पर भी उसे कम सफलता ही मिलती है।