भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१२१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर विजयी बना रहता है। वह बड़ा हिम्मती, बहादुर तथा विवेकी होता है, परन्तु मन के भीतर कुछ कमजोरी भी छिपी रहती है। उसे ननसाल के पक्ष से कुछ हानि उठानी पड़ती है। संक्षेप में ऐसा व्यक्ति विवेकी, हिम्मती तथा शत्रुजयी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा पारि- वारिक-गुत्थियों की सुलझाने में अनेक युक्तियों से काम लेना पड़ता है। अपनी गुप्त-युक्तियों द्वारा उसे व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में कुछ कमियों के साथ सफलता मिलती रहती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपने जीवन में कई बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी उठानी पड़ती है। गुप्त-युक्तियों का आश्रय लेकर जातक अपनी कठिनाइयों पर कुछ विजय भी पाता है, परन्तु कष्टों का अन्त नहीं होता। उसके शरीर में भी कोई-न-कोई रोग बना ही रहता है।