भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१२२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : नवम भाव : केतु नवें भाव में शुभ ग्रह गुरु की राशि में स्थित उच्च के प्रभाव से जातक भाग्यवान, धर्मात्मा तथा धनी होता है, परन्तु उसके जीवन में अनेक प्रकार के परिवर्तन भी आते रहते हैं तथा उसे अनेक प्रकार के संकटों एवं कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। कुल मिला कर ऐसा जातक संघर्षपूर्ण सुखी एवं धार्मिक जीवन व्यतीत करता है। २२० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : केतु . दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों से संघर्ष करना पड़ता है। उसे अपने व्यवसाय में अनेक बार परिवर्तन करने की आवश्यकता भी पड़ती है, परन्तु अपनी गुप्त-युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के बल पर वह मान-प्रतिष्ठा तथा सफलताएँ प्राप्त करता है। २२१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की आमदनी बहुत अच्छी रहती है। वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर अधिक मुनाफा कमाता है। परन्तु उसे अपनी आय के साधनों में अनेक बार परिवर्तन करने के साथ ही कठिन परि- श्रम करने की आवश्यकता भी पड़ती है। २२२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थान के सम्बन्धों में कष्ट प्राप्त होता है तथा खर्च सम्बन्धी परेशानियां भी अधिक उठानी पड़ती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के परिवर्तन भी आते रहते हैं। शुक्र के शुभ ग्रह होने के कारण कभी-कभी अल्प लाभ भी होता है तथा अच्छे कार्यों में ही व्यय होता है। २२३