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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

१२१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर विजयी बना रहता है। वह बड़ा हिम्मती, बहादुर तथा विवेकी होता है, परन्तु मन के भीतर कुछ कमजोरी भी छिपी रहती है। उसे ननसाल के पक्ष से कुछ हानि उठानी पड़ती है। संक्षेप में ऐसा व्यक्ति विवेकी, हिम्मती तथा शत्रुजयी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा पारि- वारिक-गुत्थियों की सुलझाने में अनेक युक्तियों से काम लेना पड़ता है। अपनी गुप्त-युक्तियों द्वारा उसे व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में कुछ कमियों के साथ सफलता मिलती रहती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपने जीवन में कई बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी उठानी पड़ती है। गुप्त-युक्तियों का आश्रय लेकर जातक अपनी कठिनाइयों पर कुछ विजय भी पाता है, परन्तु कष्टों का अन्त नहीं होता। उसके शरीर में भी कोई-न-कोई रोग बना ही रहता है।

१२२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : नवम भाव : केतु नवें भाव में शुभ ग्रह गुरु की राशि में स्थित उच्च के प्रभाव से जातक भाग्यवान, धर्मात्मा तथा धनी होता है, परन्तु उसके जीवन में अनेक प्रकार के परिवर्तन भी आते रहते हैं तथा उसे अनेक प्रकार के संकटों एवं कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। कुल मिला कर ऐसा जातक संघर्षपूर्ण सुखी एवं धार्मिक जीवन व्यतीत करता है। २२० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : केतु . दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों से संघर्ष करना पड़ता है। उसे अपने व्यवसाय में अनेक बार परिवर्तन करने की आवश्यकता भी पड़ती है, परन्तु अपनी गुप्त-युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के बल पर वह मान-प्रतिष्ठा तथा सफलताएँ प्राप्त करता है। २२१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की आमदनी बहुत अच्छी रहती है। वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर अधिक मुनाफा कमाता है। परन्तु उसे अपनी आय के साधनों में अनेक बार परिवर्तन करने के साथ ही कठिन परि- श्रम करने की आवश्यकता भी पड़ती है। २२२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थान के सम्बन्धों में कष्ट प्राप्त होता है तथा खर्च सम्बन्धी परेशानियां भी अधिक उठानी पड़ती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के परिवर्तन भी आते रहते हैं। शुक्र के शुभ ग्रह होने के कारण कभी-कभी अल्प लाभ भी होता है तथा अच्छे कार्यों में ही व्यय होता है। २२३

१२३ 'वृष' लग्न

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| \ ३       / २ \       १ / |
|   \     /       \     /   |
|  ४  \ / 'वृष' लग्न \ / १२ |
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| \       /   \       / |
|   \  ६  /     \  १० /   |
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|  ६  / \         / \  १० |
|   /     \     /     \   |
| /    ७    \ /    ९    \ |
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२२४

[ 'वृष' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन ] 'वृष' लग्न का फलादेश 'वृष' लग्न में जन्म लेने वाले जातक के शरीर का रंग गोरा अथवा गेहुँआ होता है। वह पुष्ट शरीर, लम्बे दाँत वाला, रजोगुणी, गुणवान, यशस्वी, बुद्धिमान, परम धैर्यवान, शूरवीर, साहसी, मधुरभाषी, यशस्वी, ईश्वरभक्त, ऐश्वर्यशाली, उदार, श्रेष्ठ संगति में बैठने वाला, कुंचित केशों वाला, दीर्घजीवी, शौकीन-मिजाज तथा स्त्रियो जैसे नाजुक-मिजाज वाला भी होता है। यह प्रकृति से अत्यन्त शान्त होता है, परन्तु अवसर पड़ने पर युद्ध अथवा संघर्ष में अपना प्रबल पराक्रम भी प्रकट कर दिखाता है। 'वृष' लग्न वाला जातक अपने परिवारीजनों से अनादृत, शस्त्राघात पाने वाला, धन-क्षय-युक्त, मित्र-वियोगी, कलह-युक्त, चिन्ताओं से पीड़ित, मानसिक-रोगी, तथा मन-ही-मन दुःखी रहने वाला भी होता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार 'वृष' लग्न वाला जातक अपनी आयु के ३६वें वर्ष के बाद अनेक प्रकार के कष्टों को भी भोगता है। 'वृष' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी-फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डलियों में संख्या २७५ से ३३२ के बीच देखना चाहिए। गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें। इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।

१२४ 'वृष' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २२५ से २३६ के बीच देखना चाहिए। २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २२५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २२६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २२७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २२८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २२९ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २३० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २३१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २३२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २३३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २३४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २३५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २३६ 'वृष' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २३७ से २४८ के बीच देखना चाहिए। २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २३७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २३८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २३९ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २४० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २४१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २४२

१२५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २४३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २४४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २४५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २४६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २४७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २४८ 'वृष लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी-फलादेश का उदाहरण-कुण्डली २४६ से २६० के बीच देखना चाहिए। २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २४६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २५० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २५१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २५२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २५३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २५४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २५५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २५६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २५७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २५८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २५६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २६०, 'वृष' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'वृष' लग्न भावों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २६१ के २७२ के बीच देखना चाहिए । २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २६१

१२६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २६२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २६३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २६४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २६५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २६६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २६७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २६८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २६६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २७० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २७१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २७२ 'वृष' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २७३ से २८४ के बीच देखना चाहिए। २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'वृष'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २७३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २७४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २७५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २७६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २७७ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २७८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २७६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २८० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २८१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २८२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २८३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २८४ 'वृष' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित

१२७ 'शुक्र' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २८५ से २९६ के बीच देखना चाहिए। २—'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २८५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २८६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २८७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २८८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २८९ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २९० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २९१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २९२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २९३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २९४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २९५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २९६ 'वृष' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २९७ से ३०८ के बीच देखना चाहिए। २. 'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए। जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २९७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २९८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २९९ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३०० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३०१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३०२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३०३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३०४

१२८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३०५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३०६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३०७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३०८ 'वृष' लग्न में 'राहु' का फलादेश १. 'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३०६ से ३२० के बीच देखना चाहिए। २. 'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भागों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३०६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३१० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३११ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३१२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३१३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३१४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३१५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३१६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३१७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३१८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३१६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३२० 'वृष' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'वृष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३२१ से ३३२ के बीच देखना चाहिए। २. 'वृष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु' (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३२१

१२६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३२२ (ग) 'मिथुन' राशिपर हो तो संख्या ३२३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३२४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३२५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३२६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३२७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३२८ (झ) 'धनु' राशिपर हो तो संख्या ३२९ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३३० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३३१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३३२ 'वृष' लग्न में 'सूर्य' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली ३२४] पहले भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है तथा शारीरिक सौन्दर्य में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सूर्य सप्तमभाव को देखता है अतः जातक को स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता एवं मनोनुकूलता प्राप्त होती है। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक प्रभावशाली तथा तेज मिजाज वाला भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य [कुण्डली ३२५] दूसरे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है, परन्तु माता के सुख में कुछ कमी बनी रहती है। साथ ही भूमि, भवन का सुख रहते हुए भी उसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। यों, जातक का दैनिक जीवन सुखी रहता है।

१३० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को भूमि, भवन एवं माता का सुख प्राप्त होता है। पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक को भाग्योन्नति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा धर्म-पालन में भी लापरवाही बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में स्वराशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा परिवार का सुख यथेष्ट मात्रा में प्राप्त होता है। जातक बड़े ठाठ-बाट से रहता है तथा दिखावा खूब करने पर भी उसके मन में कुछ अशान्ति बनी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है तथा प्रतिष्ठा एवं सफलता पाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख प्राप्त होता है तथा विद्या एवं सन्तान का पक्ष भी श्रेष्ठ रहता है। ऐसा जातक दूरदर्शी, गंभीर तथा बुद्धिमान होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण जातक को आय के साधन भी अच्छे रहते हैं और उसे समय-समय पर विशेष लाभ के अवसर भी मिलते हैं।

१३१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने शत्रुओं द्वारा कठिनाइयों का सामना तो करना पड़ता है, परन्तु वह उन पर अपना प्रभाव स्थापित कर लेता है, परन्तु फिर भी माता, भूमि व भवन के सुख में कमी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण जातक के बाहरी स्थानों से अच्छे सम्बन्ध रहते हैं। यद्यपि खर्च अधिक रहता है, परन्तु सुख भी प्राप्त होता है। ऐसे जातक को अपने जन्म स्थान से दूर जाकर भी रहना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृषलग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को व्यवसाय तथा स्त्री पक्ष में सफलताएँ मिलती हैं तथा भूमि, भवन एवं माता के सुख का भी लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा पारिवारिक सुख में कुछ कमी आती है तथा हृदय में भी थोड़ी अशान्ति बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृषलग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है तथा माता, भूमि, भवन एवं पारि- वारिक सुख में भी विघ्न उपस्थित होते रहते हैं, परन्तु पुरातत्त्व एवं आयु का विशेष लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक को कुटुम्ब एवं धन का लाभ मिलता रहता है तथा वह धनी भी होता है।

१३२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें त्रिकोण भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के घरेलू सुख तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है, परन्तु माता, भूमि एवं भवन के सम्बन्ध में कुछ असन्तोष रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। ऐसा जातक अपने पराक्रम एवं बुद्धि बल के उपयोग द्वारा ही कुछ कमियों के साथ सफलता प्राप्त करता है। २३३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें केन्द्र भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ अपूर्ण सफ- लता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से स्वराशि वाले चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन आदि के सुख का लाभ होता है तथा पारिवारिक सुख भी बढ़ता है। २३४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित उष्णग्रह सूर्य के प्रभाव में जातक को आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती रहती है तथा माता, कुटुम्ब, भूमि एवं भवन का सुख भी पर्याप्त मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण जातक के विद्या एवं सन्तान पक्ष में भी वृद्धि होती है तथा उसका जीवन आनन्दपूर्ण व्यतीत होता है। २३५

१३३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर उच्चस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध रहता है, परन्तु खर्च अधिक होता है तथा माता, परिवार एवं भूमि-भवन के सुख में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं नीचदृष्टि से शत्रु राशि के षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर बड़ी कठिनाइयों के बाद प्रभाव स्थापित हो पाता है। ऐसा जातक यदि परदेश में जाकर रहे तो उसे अधिक लाभ होता है। 'वृष' लग्न में 'चन्द्रमा' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चतुर्थेश उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव जातक का मनोबल बहुत बढ़ा रहता है। उसे अपने भाई-बहिनों का सुख यथेष्ट मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होकर सफलता एवं सम्मान की प्राप्ति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के पक्ष में असन्तोष बना रहता है तथा परिवार को चलाने में भी कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम द्वारा धनोपार्जन करता है तथा कुटुम्ब का सुख भी पाता है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख एवं पराक्रम में कुछ कमी बनी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। ऐसी ग्रहस्थिति वाला जातक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

१३४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में स्वराशिस्थ चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा परा- क्रम में वृद्धि होती है। वह अत्यन्त हिम्मती, उद्योगी तथा प्रसन्नचित्त वाला होता है, अतः सर्वत्र यश तथा प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण धर्म-पालन में विशेष रुचि नहीं होती तथा भाग्य वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम भी करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में वृद्धि होती है। साथ ही भाई- बहिन का सुख भी मिलता है तथा पराक्रम बढ़ता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण जातक को पिता तथा राज्य के क्षेत्र में विशेष परिश्रम के बाद ही सफलता मिल पाती है। संक्षेप में, ऐसा जातक सुखी जीवन बिताता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। छोटे भाई- बहिनों से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बना रहता है। सातवीं सामान्य-मित्र दृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण जातक अपने बुद्धि-बल से आमदनी के साधनों को बढ़ाता है तथा ऐश्वर्यशाली एव धनी होता है।

१३५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र \quad छठे भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शत्रु पक्ष पर अपना प्रभाव बनाये रखता है तथा झगड़े मुकद्दमों में सफलता प्राप्त करता है। अत्यन्त हिम्मती होते हुए भी जातक को कुछ भीतरी चिंताएँ घेरे रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु व्यय (खर्च) अधिक बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र \quad सातवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित नीच के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को व्यवसाय तथा स्त्री के पक्ष में हानि, चिन्ता एवं कठिनाइयों का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं उच्चदृष्टि से प्रथम भाव के देखने के कारण जातक सुन्दर शरीर वाला, प्रतिष्ठित तथा यशस्वी होता है, साथ ही उसका हृदय भी बलवान बना रहता है। कुल मिला कर ऐसे जातक का जीवन संघर्ष पूर्ण होता है। 'वृष' लग्न की कुंडली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र \quad आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है; परन्तु इस लाभ के लिए उसे अत्यधिक परिश्रम भी करना पड़ता है।

१३६ 'वृष' लग्न की कुंडली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवेंभाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक धर्मात्मा तथा भाग्यशाली होता है, साथ ही उसे भाई-बहिनों का सहयोग भी मिलता है। सातवी दृष्टि से स्वराशि वाले चतुर्थभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक हिम्मती, फुर्तीला तथा प्रसन्न स्वभाव वाला होता है।

'वृष' लग्न की कुंडली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का अपने पिता के साथ थोडा मतभेद रहता है तथा राज्य के क्षेत्र में भी अत्यधिक परिश्रम द्वारा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। भाई-बहिन का सुख अच्छा मिलता है तथा पराक्रम में भी वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण जातक को माता, भूमि, भवन तथा पारिवारिक- सुख भी यथेष्ट मात्रा में उपलब्ध होता है।

'वृष' लग्न की कुंडली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की आमदनी के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है तथा भाई-बहिन के सुख एवं पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवी मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का भी अच्छा लाभ होता है। संक्षेप में ऐसा जातक बुद्धिमान, विद्वान, सन्ततिवान, धनी, मधुरभाषी तथा ऐश्वर्यकामी होता है।

१३७ 'वृष' लग्न की कुंडली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवेंभाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च भी अधिक रहता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आ जाती है। सातवी सामान्य मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक झगड़े-टंटे तथा शत्रुओं के क्षेत्र में बड़ी युक्तियों से काम लेकर सफलता प्राप्त करता है। २४८ 'वृष' लग्न में 'मंगल' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहलेभाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित सप्तमेश एवं व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक की रक्त- विकार, धातुक्षीणता, दुर्बलता आदि की शिकायत रहती है, परन्तु शारीरिक-शक्ति का भी लाभ होता है। बाहरी स्थानों से अच्छे संबंध रहते हैं। चौथी मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्रीय सप्तम- भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। आठवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व संबंधी परेशानियां उपस्थित होती रहती हैं। २४९ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के विषय में चिन्तायें बनी रहती हैं, परन्तु बाहरी संबंधों से लाभ होता है। चौथी मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं संतान का पक्ष भी कमजोर रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण आयु एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र में भी हानि तथा चिन्तायें उपस्थित होती रहती हैं। आठवीं उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक के धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती रहती है एवं जातक भाग्यशाली माना जाता है। २५०

१३८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरेभाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन तथा पराक्रम के पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में भी ऐसा ही होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक के शत्रु नष्ट होते हैं। सातवीं उच्चदृष्टि से नवमभाव के देखने के कारण धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। आठवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव की देखने के कारण जातक को पिता एवं राज्य-पक्ष में हानि एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा प्रतिष्ठा के क्षेत्र में भी रुकावटें आती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को भूमि, भवन एवं माता के सुख की हानि होती है तथा घरेलू सुख भी कम मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता मिलती है। बाहरी स्थानों से सफलता मिलती है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। आठवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण आय के साधनों में वृद्धि होती है तथा बाहरी संबंधों द्वारों विलम्ब से लाभ होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में चिन्ता एवं हानि उठानी पड़ती है तथा स्त्री एवं व्यवसाय पक्ष में भी चिन्ताएँ रहती हैं। चौथी मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की हानि के योग भी उपस्थित होते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। आठवीं दृष्टि के स्वराशि वाले द्वादश भाव की देखने के कारण खर्च अधिक होता है तथा व्यवसाय की उन्नति के लिए अधिक परिश्रम तथा खर्च करना पड़ता है।

१३९ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु शुक्र की राशि में स्थित व्ययेश तथा सप्तमेश मंगल के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर प्रबल बना रहता है परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में हानियां उठाता है। चौथी उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण धर्म एवं भाग्य की वृद्धि करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिकतर रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। आठवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक का शरीर कमजोर रहता है तथा रक्त-वीर्य आदि के विकारों का भी शिकार बनना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में स्वराशि स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में शक्ति प्राप्त होने पर भी कठिनाइयां आती हैं तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य के क्षेत्र में कठि- नाइयां आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक का शरीर दुर्बल रहता है। आठवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ताएं तथा कठिनाइयां उपस्थित रहती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें लाभ में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सप्तमेश तथा मित्र के प्रभाव से जातक की स्त्री, व्यय- साय, आयु तथा पुरातत्त्व विषयक हानियां उठानी पड़ती हैं तथा परदेश में बसना पड़ता है। चौथी मित्र- दृष्टि से एक दशभाव को देखने के कारण विदेश द्वारा धन का लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब विषयक परेशानियां रहती हैं। आठवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आ जाती है।

१४० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री पक्ष से लाभ होता है तथा भाग्यबल से व्यावसायिक उन्नति भी होती है। धर्म में आस्था रहती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने से खर्च की अधिकता रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि-भवन तथा घरेलू सुख में भी कमी आ जाती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को पिता तथा राज्य पक्ष में परेशानियाँ आती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से व्यवसाय में लाभ होता है। स्त्री पर प्रभाव होने पर भी मनोमालिन्य बना रहता है। चौथी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शारीरिक कमजोरी तथा रक्त-विकार आदि रहते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में भी कमी रहती है आठवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान से अनबन रहती है। मित्रों का लाभ भी कम होता है, परन्तु सम्मान की वृद्धि होती रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है। तथा स्त्री-पक्ष एवं बाहरी सम्बन्धों से भी लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा संतान का पक्ष भी दुर्बल रहता है। आठवीं समदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष में प्रभाव बना रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा चतुर तथा स्वार्थी होता है।