भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१३४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में स्वराशिस्थ चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा परा- क्रम में वृद्धि होती है। वह अत्यन्त हिम्मती, उद्योगी तथा प्रसन्नचित्त वाला होता है, अतः सर्वत्र यश तथा प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण धर्म-पालन में विशेष रुचि नहीं होती तथा भाग्य वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम भी करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में वृद्धि होती है। साथ ही भाई- बहिन का सुख भी मिलता है तथा पराक्रम बढ़ता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण जातक को पिता तथा राज्य के क्षेत्र में विशेष परिश्रम के बाद ही सफलता मिल पाती है। संक्षेप में, ऐसा जातक सुखी जीवन बिताता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। छोटे भाई- बहिनों से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बना रहता है। सातवीं सामान्य-मित्र दृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण जातक अपने बुद्धि-बल से आमदनी के साधनों को बढ़ाता है तथा ऐश्वर्यशाली एव धनी होता है।