भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१३५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र \quad छठे भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शत्रु पक्ष पर अपना प्रभाव बनाये रखता है तथा झगड़े मुकद्दमों में सफलता प्राप्त करता है। अत्यन्त हिम्मती होते हुए भी जातक को कुछ भीतरी चिंताएँ घेरे रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु व्यय (खर्च) अधिक बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र \quad सातवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित नीच के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को व्यवसाय तथा स्त्री के पक्ष में हानि, चिन्ता एवं कठिनाइयों का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं उच्चदृष्टि से प्रथम भाव के देखने के कारण जातक सुन्दर शरीर वाला, प्रतिष्ठित तथा यशस्वी होता है, साथ ही उसका हृदय भी बलवान बना रहता है। कुल मिला कर ऐसे जातक का जीवन संघर्ष पूर्ण होता है। 'वृष' लग्न की कुंडली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र \quad आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है; परन्तु इस लाभ के लिए उसे अत्यधिक परिश्रम भी करना पड़ता है।