भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर उच्चस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध रहता है, परन्तु खर्च अधिक होता है तथा माता, परिवार एवं भूमि-भवन के सुख में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं नीचदृष्टि से शत्रु राशि के षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर बड़ी कठिनाइयों के बाद प्रभाव स्थापित हो पाता है। ऐसा जातक यदि परदेश में जाकर रहे तो उसे अधिक लाभ होता है। 'वृष' लग्न में 'चन्द्रमा' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चतुर्थेश उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव जातक का मनोबल बहुत बढ़ा रहता है। उसे अपने भाई-बहिनों का सुख यथेष्ट मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होकर सफलता एवं सम्मान की प्राप्ति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के पक्ष में असन्तोष बना रहता है तथा परिवार को चलाने में भी कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चतुर्थेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम द्वारा धनोपार्जन करता है तथा कुटुम्ब का सुख भी पाता है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख एवं पराक्रम में कुछ कमी बनी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। ऐसी ग्रहस्थिति वाला जातक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।