भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१३२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें त्रिकोण भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के घरेलू सुख तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है, परन्तु माता, भूमि एवं भवन के सम्बन्ध में कुछ असन्तोष रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। ऐसा जातक अपने पराक्रम एवं बुद्धि बल के उपयोग द्वारा ही कुछ कमियों के साथ सफलता प्राप्त करता है। २३३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें केन्द्र भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ अपूर्ण सफ- लता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से स्वराशि वाले चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन आदि के सुख का लाभ होता है तथा पारिवारिक सुख भी बढ़ता है। २३४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित उष्णग्रह सूर्य के प्रभाव में जातक को आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती रहती है तथा माता, कुटुम्ब, भूमि एवं भवन का सुख भी पर्याप्त मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण जातक के विद्या एवं सन्तान पक्ष में भी वृद्धि होती है तथा उसका जीवन आनन्दपूर्ण व्यतीत होता है। २३५