भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१३० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को भूमि, भवन एवं माता का सुख प्राप्त होता है। पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक को भाग्योन्नति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा धर्म-पालन में भी लापरवाही बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में स्वराशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा परिवार का सुख यथेष्ट मात्रा में प्राप्त होता है। जातक बड़े ठाठ-बाट से रहता है तथा दिखावा खूब करने पर भी उसके मन में कुछ अशान्ति बनी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है तथा प्रतिष्ठा एवं सफलता पाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख प्राप्त होता है तथा विद्या एवं सन्तान का पक्ष भी श्रेष्ठ रहता है। ऐसा जातक दूरदर्शी, गंभीर तथा बुद्धिमान होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण जातक को आय के साधन भी अच्छे रहते हैं और उसे समय-समय पर विशेष लाभ के अवसर भी मिलते हैं।