भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१२६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३२२ (ग) 'मिथुन' राशिपर हो तो संख्या ३२३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३२४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३२५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३२६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३२७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३२८ (झ) 'धनु' राशिपर हो तो संख्या ३२९ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३३० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३३१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३३२ 'वृष' लग्न में 'सूर्य' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली ३२४] पहले भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है तथा शारीरिक सौन्दर्य में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सूर्य सप्तमभाव को देखता है अतः जातक को स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता एवं मनोनुकूलता प्राप्त होती है। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक प्रभावशाली तथा तेज मिजाज वाला भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य [कुण्डली ३२५] दूसरे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित चतुर्थेश सूर्य के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है, परन्तु माता के सुख में कुछ कमी बनी रहती है। साथ ही भूमि, भवन का सुख रहते हुए भी उसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। यों, जातक का दैनिक जीवन सुखी रहता है।