भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री पक्ष से लाभ होता है तथा भाग्यबल से व्यावसायिक उन्नति भी होती है। धर्म में आस्था रहती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने से खर्च की अधिकता रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि-भवन तथा घरेलू सुख में भी कमी आ जाती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को पिता तथा राज्य पक्ष में परेशानियाँ आती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से व्यवसाय में लाभ होता है। स्त्री पर प्रभाव होने पर भी मनोमालिन्य बना रहता है। चौथी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शारीरिक कमजोरी तथा रक्त-विकार आदि रहते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में भी कमी रहती है आठवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान से अनबन रहती है। मित्रों का लाभ भी कम होता है, परन्तु सम्मान की वृद्धि होती रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है। तथा स्त्री-पक्ष एवं बाहरी सम्बन्धों से भी लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा संतान का पक्ष भी दुर्बल रहता है। आठवीं समदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष में प्रभाव बना रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा चतुर तथा स्वार्थी होता है।