भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३९ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु शुक्र की राशि में स्थित व्ययेश तथा सप्तमेश मंगल के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर प्रबल बना रहता है परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में हानियां उठाता है। चौथी उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण धर्म एवं भाग्य की वृद्धि करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिकतर रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। आठवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक का शरीर कमजोर रहता है तथा रक्त-वीर्य आदि के विकारों का भी शिकार बनना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में स्वराशि स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में शक्ति प्राप्त होने पर भी कठिनाइयां आती हैं तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य के क्षेत्र में कठि- नाइयां आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक का शरीर दुर्बल रहता है। आठवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ताएं तथा कठिनाइयां उपस्थित रहती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें लाभ में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सप्तमेश तथा मित्र के प्रभाव से जातक की स्त्री, व्यय- साय, आयु तथा पुरातत्त्व विषयक हानियां उठानी पड़ती हैं तथा परदेश में बसना पड़ता है। चौथी मित्र- दृष्टि से एक दशभाव को देखने के कारण विदेश द्वारा धन का लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब विषयक परेशानियां रहती हैं। आठवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आ जाती है।