भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरेभाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन तथा पराक्रम के पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में भी ऐसा ही होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक के शत्रु नष्ट होते हैं। सातवीं उच्चदृष्टि से नवमभाव के देखने के कारण धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। आठवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव की देखने के कारण जातक को पिता एवं राज्य-पक्ष में हानि एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा प्रतिष्ठा के क्षेत्र में भी रुकावटें आती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को भूमि, भवन एवं माता के सुख की हानि होती है तथा घरेलू सुख भी कम मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता मिलती है। बाहरी स्थानों से सफलता मिलती है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। आठवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण आय के साधनों में वृद्धि होती है तथा बाहरी संबंधों द्वारों विलम्ब से लाभ होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में चिन्ता एवं हानि उठानी पड़ती है तथा स्त्री एवं व्यवसाय पक्ष में भी चिन्ताएँ रहती हैं। चौथी मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की हानि के योग भी उपस्थित होते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। आठवीं दृष्टि के स्वराशि वाले द्वादश भाव की देखने के कारण खर्च अधिक होता है तथा व्यवसाय की उन्नति के लिए अधिक परिश्रम तथा खर्च करना पड़ता है।